राजा भोज थे सरस्वती मां के उपासक, मध्य प्रदेश के धार में 1034 ईस्वी में कराया था भोजशाला का निर्माण

3 वर्ष पहले
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रिलिजन डेस्क. हर साल वसंत पंचमी के मौके पर मध्य प्रदेश के धार में भोजशाला का विवाद शुरू हो जाता है। यह विवाद सदियों से चला आ रहा है। मुस्लिम जहां इसे मस्जिद मानते हैं, तो हिंदू भोजशाला। इस साल भी यहां वसंत पंचमी के दिन विशेष पूजा अर्चना की जाएगी। धार में क्यों होता है विवाद, क्या है इसके पीछे की कहानी...

1) भोजशाला के जुड़ी विशेष बातें

कहते हैं कि राजा भोज देवी सरस्वती के उपासक थे। उन्होंने धार में 1034 ईस्वी में भोजशाला के रूप में एक भव्य पाठशाला बनवाकर उनकी प्रतिमा स्थापित की।

  • कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला को ध्वस्त कर दिया।बाद में दिलावर खां गौरी ने 1401 ईस्वी में भोजशाला के एक भाग में मस्जिद बनवा दी।
  • 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने शेष भाग पर भी मस्जिद बनवा दी।अंग्रेजी राज से यहां विवाद की स्थिति बन गई, जो आजादी के बाद लगातार तेज होती गई। वसंत पंचमी को हिन्दू भोजशाला के गर्भगृह में सरस्वतीजी का चित्र रखकर पूजन करते हैं। 
  • 1909 में धार रियासत द्वारा 1904 के एशिएंट मोन्यूमेंट एक्ट को लागू कर धार दरबार के गजट जिल्द में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया। 
  • बाद में भोजशाला को पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के पास इसकी देखरेख का जिम्मेदारी है। 
  • धार स्टेट ने ही 1935 में परिसर में शुक्रवार को नमाज पढने की अनुमति दी थी। पहले भोजशाला शुक्रवार को ही खुलती थी और वहां नमाज हुआ करती थी। 
  • 2003 से व्यवस्था में कुछ बदलाव किए गए जिसके तहत हर मंगलवार और बसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिन्दुओं को पूजा की अनुमति और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज की अनुमति दी गई। 
  • वहीं बाकि के पांच दिनों में भोजशाला पर्यटकों के लिए यह खुली रहती है।

1995 में हुए विवाद के बाद से यहां मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज पढऩे की अनुमति दी गई। 12 मई 1997 को कलेक्टर ने भोजशाला में आम लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया, और मंगलवार की पूजा पर रोक लगा दी गई। हिन्दुओं को बसंत पंचमी पर और मुसलमानों को शुक्रवार को 1 से 3 बजे तक नमाज पढऩे की अनुमति दी गई। ये प्रतिबंध 31 जुलाई 1997 को हटा दिया गया।

  • 6 फरवरी 1998 को केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने आगामी आदेश तक प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया। 2003 में मंगलवार को फिर से पूजा करने की अनुमति दी गई। बगैर फूल-माला के पूजा करने के लिए कहा गया। पर्यटकों के लिए भी भोजशाला को खोला गया।18 फरवरी 2003 को भोजशाला परिसर में सांप्रदायिक तनाव के बाद हिंसा फैली।
  • 2013 में भी बसंत पंचमी और शुक्रवार एक दिन आने पर धार में माहौल बिगड़ गया था। हिन्दुओं के जगह छोड़ने से इनकार करने पर पुलिस को हवाई फायरिंग और लाठीचार्ज करना पड़ा था। इसके बाद  माहौल बिगड़ गया।इसके बाद साल साल 2016 में भी शुक्रवार के दिन बसंत पंचमी पड़ने से यहां तनाव का माहौल बन गया था। 

हिन्दू संगठन जहां भोजशाला को राजा भोज कालीन इमारत बताते हुए इस हिन्दू समाज का अधिकार बताते हुए इस सरस्वती का मंदिर मानते हैं। हिन्दुओं का तर्क है कि राजवंश काल में यहां मुस्लिमों को कुछ समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समाज का कहना है कि वे सालों से यहां नमाज पढ़ते आ रहे हैं, यह जामा मस्जिद है, जिसे भोजशाला-कमाल मौलाना मस्जिद कहते हैं।

धार की भोजशाला में बसंत पंचमी मां सरस्वती की विशेष पूजा अर्चना सूर्योदय के साथ के शूरू हो जाती है। इस दिन भक्त मंदिर में आकर मां सरसवती की पूजा अर्चना कर सरस्वती यज्ञ में भाग लेते हैं। इसके लिए भोजशाला को विशेष रूप से सजाया गया है। इस अवसर पर शोभायात्रा भी निकाली जाती है।