उत्सव / कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी पर तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराने की है परंपरा



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  • असुर शंखचुड़ की पत्नी थी तुलसी, शिवजी ने विष्णुजी की मदद से किया था शंखचूड़ का वध, तुलसी ने विष्णुजी को पत्थर बन जाने का दिया था शाप

Dainik Bhaskar

Nov 04, 2019, 04:56 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क। शुक्रवार, 8 नवंबर को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है, इसे देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन तुलसी का पूजा का महत्व है। तुलसी का विवाह शालिग्रामजी के करवाया जाता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार नेपाल में बहने वाली गंडकी नदी भी तुलसी का ही एक स्वरूप है। इस बारे में शास्त्रों में कथा भी बताई गई है। जानिए गंडकी नदी से जुड़ी खास बातें...

असुर शंखचूड़ की पत्नी थी तुलसी

शिवपुराण के अनुसार दैत्यों के राजा असुर शंखचूड़ की पत्नी का नाम तुलसी था। शंखचूड़ की वजह से सभी देवताओं के लिए परेशानियां बढ़ गई थीं। जब तक उसकी पत्नी तुलसी का पतिव्रत भंग नहीं होता, तब तक सभी देवता मिलकर भी शंखचूड़ का वध नहीं कर सकते थे। जब शंखचूड़ का अत्याचार बढ़ने लगा तो सभी देवता और ऋषि भगवान शिव के पास पहुंचे। शिवजी की मदद के लिए भगवान विष्णु ने छल से तुलसी का पतिव्रत भंग कर किया और शिवजी ने शंखचूड़ का वध कर दिया। जब ये बात तुलसी को मालूम हुई तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का शाप दिया। विष्णुजी ने तुलसी का शाप स्वीकार किया और कहा कि अब से गंडकी नदी और तुलसी के पौधे के रूप में तुम्हारी पूजा होगी। मेरी पूजा में भी तुलसी की पत्तियां रखना अनिवार्य होगा।

गंडकी नदी में मिलते हैं शालिग्राम

नेपाल में बहने वाली गंडकी नदी में एक विशेष प्रकार के काले पत्थर मिलते हैं, जिन पर चक्र, गदा आदि के निशान होते हैं। यही पत्थर भगवान विष्णु का स्वरूप माने गए हैं। इन्हें शालिग्राम कहा जाता है। शिवपुराण में भगवान विष्णु ने खुद ही गंडकी नदी में अपना वास बताया था और कहा था कि गंडकी नदी के तट पर मेरा वास होगा। नदी में रहने वाले करोड़ों कीड़े अपने तीखे दांतों से काट-काटकर इन पत्थरों पर मेरे चक्र का चिह्न बनाएंगे और इसी कारण ये पत्थर मेरा स्वरूप मान कर पूजे जाएंगे।

शालिग्राम और तुलसी विवाह की है परंपरा

विष्णुजी और तुलसी से जुड़ी एक और मान्यता प्रचलित है। इस मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में तुलसी ने भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए कई सालों तक तपस्या की थी, इसके फलस्वरूप भगवान विष्णुे ने उसे विवाह करने का वरदान दिया था। जिसे देवप्रबोधिनी एकादशी पर पूरा किया जाता है। देवप्रबोधिनी एकादशी पर शालिग्राम शिला और तुलसी के पौधा का विवाह करवाने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है।

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