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महाभारत : युद्ध में भीष्म के बाद कौरव सेना की बागडोर गुरु द्रोणाचार्य के हाथों में आ गई और वे लगातार नई-नई व्यूह रचनाओं से पांडवों की सेना का नाश कर रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने कहा - किसी भी सूरत में द्रोणाचार्य को रोकना होगा

द्रोणाचार्य को शस्त्रों से रोकना मुश्किल था, तब क्या किया श्रीकृष्ण ने?

Dainik Bhaskar

Oct 13, 2018, 05:49 PM IST
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रिलिजन डेस्क। महाभारत युद्ध चल रहा था। भीष्म तीरों की शय्या पर लेट चुके थे। कौरव सेना की बागडोर गुरु द्रोणाचार्य के हाथों में थी। द्रोणाचार्य लगातार नई-नई व्यूह रचनाओं से पांडवों की सेना का नाश कर रहे थे। पांडवों की सेना में हड़कंप मचा हुआ था। तब श्रीकृष्ण ने कहा किसी भी सूरत में द्रोणाचार्य को रोकना होगा, नहीं तो पांडव सेना समाप्त हो जाएगी।

द्रोणाचार्य को शस्त्रों से रोकना मुश्किल था

द्रोणाचार्य को शस्त्रों से रोकना मुश्किल था, सो कूट नीति का सहारा लिया गया। कौरव सेना के एक हाथी का नाम अश्वत्थामा था, श्रीकृष्ण ने भीम को कहा कि उसे मार दे। भीम ने ऐसा ही किया और शोर मचाया कि मैंने अश्वत्थामा को मार दिया। द्रोणाचार्य के पुत्र का नाम भी अश्वत्थामा था।

श्रीकृष्ण ने बजा दिया विजयी शंख

गुरु द्रोण इसकी पुष्टी करने के लिए युधिष्ठिर के पास गए। युधिष्ठिर से पूछा कि क्या वाकई अश्वत्थामा मारा गया है तो युधिष्ठिर ने कहा हां मारा गया। इसी बीच श्रीकृष्ण ने विजयी शंख बजा दिया। युधिष्ठिर ने यह भी कहा था हाथी या मनुष्य, यह नहीं पता, लेकिन द्रोण शंख के शोर में ये सुन नहीं पाए। वे पुत्रशोक में ध्यान लगाकर बैठ गए और धृष्ठघुम्र ने उनका सिर काट दिया।

टूट गया युधिष्ठिर का सत्यव्रत

युधिष्ठिर ने सत्यव्रत लिया था। वे कभी झूठ नहीं बोलते थे। कहते हैं, इसी के प्रभाव से उनका रथ धरती से तीन अंगुल ऊपर चलता था। द्रौणाचार्य से बात के बाद उनका रथ जमीन पर आ गया। युधिष्ठिर ने झूठ नहीं बोला, लेकिन उन्होंने एक झूठे कर्म में सहयोग दिया। इस कर्म के कारण उनकी सत्य सिद्धि जाती रही।

हम जब भी कोई सिद्धि या सफलता प्राप्त करते हैं तो उसके अनुशासन को भूलकर भी ना तोड़ना चाहए। नहीं तो वह सफलता पलभर में हमारा साथ छोड़ देगी। हमेशा अनुशासन बनाए रखना चाहिए।

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