तीज-त्योहार / वट पूर्णिमा का व्रत 16 जून को, इसकी कथा, पूजा विधि और महत्व



Vat Purnima Vrat on June 16: Vrat Katha Vrat ki Vidhi and Importance of Vat Purnima 2019
X
Vat Purnima Vrat on June 16: Vrat Katha Vrat ki Vidhi and Importance of Vat Purnima 2019

Dainik Bhaskar

Jun 14, 2019, 08:04 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क. हिन्दू धर्म में ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा महत्त्वपूर्ण है। ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन स्त्रियाँ वट वृक्ष की पूजा कर के पूरे दिन व्रत रखती हैं। इसे वट सावित्री व्रत कहा जाता है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है। सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा ये व्रत किया जाता है। इसी दिन यानी ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा पर गंगा स्नान कर के पूजा-अर्चना करने से मनोकामना पूरी होती है। इसी दिन से ही लोग गंगा जल लेकर अमरनाथ यात्रा के लिए भी निकलते हैं।

 

  • वट सावित्री व्रत

वट पूर्णिमा व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की सलामती और लंबी उम्र के लिए रखती हैं। पूर्णिमांत कैलेंडर यानी पूर्णिमा से शुरू होने वाल हिन्दू महीने में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या पर मनाया जाता है, जो शनि जयंती के साथ पड़ता है। वहीं अमांत कैलेंडर यानी अमावस्या से हिन्दू महीने की शुरुआत वाले कैलेंडर में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा पर मनाया जाता है, जिसे वट पूर्णिमा व्रत भी कहा जाता है। इसलिए महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिणी भारतीय राज्यों में विवाहित महिलाएं उत्तर भारतीय महिलाओं की तुलना में 15 दिन बाद वट सावित्री व्रत मनाती हैं। 

पौराणिक कथा के अनुसार, सावित्री ने अपने तप और सतीत्व की ताकत से मृत्यु के स्वामी भगवान यम को अपने पति सत्यवान के जीवन को वापस करने के लिए मजबूर किया। इसलिए विवाहित महिलाएं अपने पति की सलामती और लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत का पालन करती हैं।

 

 

वट पूर्णिमा व्रत की कथा

 

  • सावित्री भारतीय संस्कृति में ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है। सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी होता है। सावित्री का जन्म भी विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। पौराणिक कथा के अनुसार मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया और मंत्रोच्चार के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दीं। अठारह सालों तक यह चलता रहा। इसके बाद सावित्री देवी ने प्रकट होकर वर दिया कि हे राजन तम्हें शीघ्र ही एक तेजस्वी कन्या प्राप्त होगी। सावित्री देवी की कृपा से जन्म लेने की वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

 

  • बड़ी होने पर कन्या सावित्री बेहद सुंदरता से पूर्ण हुईं। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहां  साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। कहते हैं कि साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल के इर्द-गिर्द था। सत्यवान अल्पायु थे। वे वेद ज्ञाता थे। नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी, परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह किया। पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन शेष रह गए, तब सावित्री ने घोर तपस्या की थी, जिसका फल उन्हें बाद में मिला था।

 

  • वट पूर्णिमा का महत्त्व

वट पूर्णिमा का व्रत करने से महिलाओं को सौभाग्य मिलता है। संतान और पति की उम्र बढ़ती है। इस व्रत के प्रभाव से अनजाने में किए गए पाप भी खत्म् हो जाते हैं। ये व्रत ज्येष्ठ माह में पड़ता है। इसलिए इस व्रत का महत्व और ज्यादा है। हिन्दू धर्म में ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा महत्त्वपूर्ण है। इस दिन गंगा स्नान कर पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है। इस दिन से ही लोग गंगा जल लेकर अमरनाथ यात्रा के लिये निकलते हैं। 

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना