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यमराज का 1000 साल से ज्यादा पुराना मंदिर, जहां कामदेव को मिला था जीवनदान

एक वर्ष पहले
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जीवन मंत्र डेस्क. तमिलनाडु के तंजावुर जिले में थिरुचिट्रमबलम में यम तीर्थ स्थित है। ये मंदिर मृत्यु के देवता यम को समर्पित है। यहां धर्मराज स्वामी के रूप में इनकी पूजा की जाती है। ये मंदिर भगवान शिव, कामदेव और यमराज से जुड़ा है। माना जाता है कि भगवान शिव के तीसरे नैत्र से भस्म हुए कामदेव को इसी जगह यमराज द्वारा जीवनदान दिया गया था। इसलिए यहां मृत्यु के देवता यम की पूजा की जाती है।
 

  • करीब 1000 साल से ज्यादा पुराना मंदिर

यमराज का ये मंदिर लगभग 1 से 2 हजार साल पुराना है। इस मंदिर में प्रमुख देवता के रूप में धर्मराज यम की पूजा की जाती है। यहां भैंसे पर बैठै हुए यमराज की मूर्ति है। यहां होने वाले 10 दिन के आदी त्योहार के दौरान धर्मराज यम को राजा के रूप में शाही तरीके से तैयार किया जाता है। जैसे वो शिकार के लिए जा रहे हो। यमराज की इस मूर्ति के हाथों में रस्सी, ताड़ के पत्ते और गदा हैं। मूर्ति के पास ही नीचे काल नाम का उनका दूत और चित्रगुप्त विराजमान हैं। यहां नैवेद्य के रूप में  कच्चे चावल का हलवा चढ़ाया जाता है। कामदेव को यहां जीवनदान मिलने के कारण इस जगह को कामन पोटल भी कहा जाता है।  

  • अन्य देवता

यहां पम्बति सिद्ध स्वामी, अय्यनार और उनकी पत्नी पूर्णा और पुष्कला की मूर्तियां भी हैं। इनके साथ ही इस मंदिर में धर्मराज यम के प्रकोप को कम करने के लिए भगवान राजा गणपति को सामने और पीछे की ओर भगवान बलदंडयुथपानी को विराजमान किया हुआ है। इस मंदिर में दक्षिण भारत के देवी-देवता वीरनार, रक्काची, मुथुमानी, करुप्पु सामी, कोम्बुक्करन और वाडुवाची भी हैं।   

मंदिर का महत्व

  • धर्मराज यम को न्याय का देवता माना गया है। इसलिए जिन लोगों के साथ धोखा या ठगी हुई हो या जिन लोगों का कोई सामान खो गया हो वो लोग यहां न्याय पाने के लिए प्रार्थना करने आते हैं। लोग यहां अपनी परेशानी या प्रार्थना को एक कागज में लिखकर त्रिशूल पर बांध देते हैं। मान्यता के अनुसार ऐसा करने पर थोड़े ही दिनों में वो परेशानी खत्म हो जाती है और मनोकामना भी पूरे हो जाती है। इसे पडी कटुधल कहा जाता है। लंबी उम्र पाने के लिए यहां अयुल वृद्धि होम के रूप में शनिवार को विशेष होम किया जाता है।
  • मान्यता है कि इस मंदिर में धर्मराज स्वामी यम के दर्शन करने से पाप और बुरे दोष खत्म हो जाते हैं। इसके साथ ही लंबी उम्र मिलती है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में दर्शन करने वाल लोगों की अकाल मृत्यु नहीं होती। कार्तिक महीने की चतुर्दशी तिथि को यहां धर्मराज यम की विशेष पूजा की जाती है। इस मंदिर में यमराज के क्रोध के डर से महिलाएं इस मंदिर में स्नान नहीं करतीं।

   

मंदिर की कहानी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार सभी देवी-देवता भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत गए। वहां भगवान शिव अपने नैत्र बंदकर के तपस्या में लीन बैठे थे। देवी-देवताओं ने कामदेव को भगवान शिव का ध्यान भंग करने के लिए प्रेरित किया। कामदेव ने जैसे ही भगवान शिव का ध्यान भंग किया उसी समय भगवान के तीनों नैत्र खुल गए और भगवान शिव के नैत्रों में से अग्नि निकली, जिससे कामदेव वहीं भस्म हो गए। कामदेव के प्राण त्याग देने के बाद उनकी पत्नी रति को बहुत दुख हुआ। इसके बाद धर्मराज यम ने कामदेव को जीवनदान देने के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की। माना जाता है इसी जगह कामदेव को जीवनदान मिला। इसके बाद इसी जगह धर्मराज यम ने लोगों के प्राण लेने वाले इस कार्य के लिए भगवान शिव से अनुमति ली और भगवान शिव ने यमराज को अनुमति दी। इसी कहानी के अनुसार धर्मराज यम का ये मंदिर बना।

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