बुद्ध पूर्णिमा / बेहतर जीवन के लिए गौतम बुद्ध के दो सूत्र करूणा और प्रेम, इनके बिना सुख संभव नहीं

Dainik Bhaskar

May 18, 2019, 12:47 PM IST



भगवान गौतम बुद्ध और इनसेट में 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो भगवान गौतम बुद्ध और इनसेट में 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो
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भगवान गौतम बुद्ध और इनसेट में 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सोभगवान गौतम बुद्ध और इनसेट में 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो

  • क्रोध को जिस पल त्याग देंगे, मन में करूणा और प्रेम का जन्म हो जाएगा

जीवन मंत्र डेस्क. भगवान गौतम बुद्ध का संपूर्ण जीवन दो सिद्धांतों के आसपास ही चला, पहला करूणा और दूसरा प्रेम। मानव जीवन को इन दो तत्वों की परम आवश्यकता हमेशा से रही है। इनके बिना सुखी जीवन की ओर यात्रा प्रारंभ नहीं हो सकती। हम जितने करूणा और प्रेम से भरे रहेंगे, जीवन में सुख की ओर उतनी ही तरलता से अग्रसर होंगे। भगवान बुद्ध ने अपनी वाणी और जीवन लीला में कई बार इन दो तत्वों का उदाहरण प्रस्तुत किया। संपूर्ण बौद्ध धर्म की आधार शिला ही ये विचार है कि जीवन क्रोध रहित, करूणा और प्रेम से भरा हो। क्रोध का त्याग, करूणा और प्रेम की उत्पत्ति का प्रारंभ बिंदु है। 14वें दलाई लामा के ऐसे ही कुछ बहुप्रचारित विचार जो समय-समय पर संसार को दिए गए हैं। 

 

 

 

करुणाशील मानवीय स्नेह वास्तव में महत्वपूर्ण है, हमारा चित्त जितना अधिक करुणाशील होगा, हमारे मस्तिष्क का कार्य उतना बेहतर होगा। यदि हमारा चित्त भय और क्रोध जनित करता है, जब ऐसा होता है तो हमारा दिमाग अधिक बुरी तरह से काम करता है। एक अवसर पर मेरी एक वैज्ञानिक से भेंट हुई, जो अस्सी वर्ष का था। उसने मुझे अपनी पुस्तकों में से एक दी। मुझे लगता है कि उसका शीर्षक था, हम क्रोध के बंदी हैं, ऐसा कुछ। अपने अनुभव पर चर्चा करते हुए, उन्होंने कहा कि जब हम किसी वस्तु की ओर क्रोध उत्पन्न करते हैं तो वस्तु बहुत नकारात्मक प्रतीत होती है। पर, उस नकारात्मकता का 90 प्रतिशत हमारा अपना मानसिक प्रक्षेपण है। यह उसके अपने अनुभव से था।

 

 

बौद्ध धर्म भी वही कहता है। जब नकारात्मक भावना विकसित होती है तो हम वास्तविकता नहीं देख सकते। जब हमें निर्णय करने की आवश्यकता होती है और चित्त पर क्रोध हावी हो जाता है तो संभावना है कि हम गलत निर्णय लेंगे। कोई भी गलत फैसला नहीं करना चाहता, पर उस क्षण हमारी बुद्धि और मस्तिष्क का वह हिस्सा जो सही गलत में अंतर करता है और सबसे सही निर्णय लेता है, वह बहुत बुरी तरह से काम करता है। यहां तक कि महान नेताओं ने भी ऐसा अनुभव किया है।

इसलिए, करुणा व स्नेह मस्तिष्क को अधिक आसानी से कार्य करने में सहायता करते हैं। दूसरी बात, करुणा हमें आंतरिक शक्ति देती है, यह हमें आत्मविश्वास देती है और भय कम होता है, जो फिर हमारे दिमाग को शांत रखता है। इसलिए, करुणा के दो कार्य हैं, यह हमारे मस्तिष्क को बेहतर कार्य करने में सक्षम करता है और आंतरिक शक्ति लाता है। ये ही सुख के कारण हैं। मुझे लगता है कि ऐसा है।

अब अन्य संकाय भी निश्चित रूप से सुख के लिए अच्छे हैं। उदाहरणार्थ सभी को धन पसंद है। यदि हमारे पास पैसा है तो हम अच्छी सुविधाओं का आनंद ले सकते हैं। साधारणतया हम इनको सबसे महत्वपूर्ण चीजें मानते हैं, पर मुझे लगता है कि ऐसा नहीं है। शारीरिक प्रयास के माध्यम से भौतिक सुख प्राप्त हो सकता है, परन्तु मानसिक प्रयास से चित्त की शांति आनी चाहिए। यदि हम दुकान पर जाकर दुकानदार को पैसे देकर कहें कि हम चित्त की शांति खरीदना चाहते हैं तो वे कहेंगे कि उनके पास बेचने के लिए कुछ भी नहीं है। कुछ दुकानदारों को लगेगा कि यह कुछ पागलपन है और वे हम पर हंसेंगे। कुछ इंजेक्शन या गोली शायद अस्थायी खुशी या चित्त की शांति दे सकते हैं, परन्तु पूर्ण रूप से नहीं। हम परामर्श के उदाहरण से देख सकते हैं कि हमें चर्चाओं और तर्कों के माध्यम से भावनाओं से निपटने की आवश्यकता है। इस प्रकार हमें एक मानसिक दृष्टिकोण का उपयोग करना चाहिए। अतः जब भी मैं व्याख्यान देता हूं, मैं कहता हूँ कि हम आधुनिक लोग बाहरी विकास पर अत्यधिक सोचते हैं। यदि हम केवल उस स्तर पर ध्यान दें, तो वह पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सुख और संतुष्टि भीतर से आनी चाहिए।

उसके लिए बुनियादी तत्व हैं करुणा और मानव स्नेह। और ये जीव विज्ञान से आते हैं। एक शिशु के रूप में हमारा अस्तित्व मात्र स्नेह पर निर्भर करता है। यदि स्नेह है तो हम सुरक्षित महसूस करते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो हम व्याकुल व असुरक्षित अनुभव करते हैं। यदि हम अपनी मां से अलग हो जाएं तो हम रोते हैं। यदि हम अपनी मां की बाहों में हैं और मां ने हमें कस कर, प्रेम से पकड़ी हुई हैं, तो हम खुश होते हैं और चुप रहते हैं। एक बच्चे के रूप में, यह एक जैविक कारण है। उदाहरण के लिए, एक वैज्ञानिक, मेरे शिक्षक, एक जीवविज्ञानी जो परमाणु हिंसा के विरोधी हैं, ने मुझे बताया कि जन्म के बाद, कई हफ्तों के लिए एक मां का शारीरिक स्पर्श बच्चे के मस्तिष्क के विस्तार और विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह सुरक्षा और आराम की भावना लाता है और यह मस्तिष्क सहित भौतिक विकास के उचित विकास की ओर ले जाता है।

इस तरह करुणा और स्नेह का बीज धर्म से नहीं आता, यह जीव विज्ञान से आता है। हममें से प्रत्येक अपनी मां के गर्भ से आए हैं और हममें से प्रत्येक अपनी मां की देखभाल और स्नेह के कारण जीवित रहे। भारतीय परंपरा में, हम एक शुद्ध भूमि में कमल से जन्म को मानते हैं। यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है, पर संभवतः वहां लोगों को व्यक्तियों की तुलना में कमल के प्रति अधिक स्नेह है। अतः माता के गर्भ से पैदा होना बेहतर है। ऐसी स्थिति में हम पहले से ही करुणा के बीज से सुसज्जित हैं। तो, वे सब सुख के कारण हैं।

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