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kumbh mela 2019: प्रयागराज में अर्ध कुंभ आज से, सिर्फ 4 शहरों में ही क्यों आयोजित होता है कुंभ, कैसे शुरू हुई कुंभ मेले की परंपरा  / kumbh mela 2019: प्रयागराज में अर्ध कुंभ आज से, सिर्फ 4 शहरों में ही क्यों आयोजित होता है कुंभ, कैसे शुरू हुई कुंभ मेले की परंपरा 

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 06:00 PM IST

कुंभ में स्नान करने का है विशेष महत्व, क्या है इससे जुड़ा इतिहास?  

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रिलिजन डेस्क। आज (15 जनवरी, मंगलवार) से प्रयागराज में अर्ध कुंभ (kumbh mela 2019) शुरू हो रहा है, जो 3 मार्च तक रहेगा। इस दौरान 13 अखाड़ों के लाखों साधु-संत शामिल होंगे और गंगा नदीं में स्नान करेंगे। इसके साथ ही देश-विदेश से आए श्रृद्धालु भी अर्ध कुंभ में आएंगे। हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में विशेष ज्योतिषीय योगों में कुंभ मेला आयोजित किया जाता है, लेकिन अर्ध कुंभ की परंपरा सिर्फ प्रयागराज और हरिद्वार में ही है। कुंभ क्यों आयोजित किया जाता है और इसका क्या इतिहास है। इसकी जानकारी इस प्रकार है...

क्यों आयोजित होता है कुंभ मेला?

- एक बार देवताओं व दानवों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया। मदरांचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुद्र को मथा गया। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले।
- अंत में भगवान धनवंतरि अमृत का घड़ा लेकर प्रकट हुए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं और दैत्यों में उसे पाने के लिए लड़ाई छिड़ गई। ये युद्ध लगातार 12 दिन तक चलता रहा।
- इस लड़ाई के दौरान पृथ्वी के 4 स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत की बूंदें गिरी। लड़ाई शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर छल से देवताओं को अमृत पिला दिया।
- अमृत पीकर देवताओं ने दैत्यों को मार भगाया। काल गणना के आधार पर देवताओं का एक दिन धरती के एक साल के बराबर होता है। इस कारण हर 12 साल में इन चारों जगहों पर महाकुंभ का आयोजन किया जाता है।

कुंभ मेले का इतिहास

- विद्वानों का मानना है कि कुंभ मेले की परंपरा तो बहुत पुरानी है, लेकिन उसे व्यवस्थित रूप देने का श्रेय आदि शंकराचार्य को जाता है।
- जिस तरह उन्होंने चार मुख्य तीर्थों पर चार पीठ स्थापित किए, उसी तरह चार तीर्थ स्थानों पर कुंभ मेले में साधुओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की।
- आज भी कुंभ मेलों में शंकराचार्य मठ से संबद्ध साधु-संत अपने शिष्यों सहित शामिल होते हैं।

महाभारत काल में भी होता था कुंभ

- शैवपुराण की ईश्वर संहिता व आगम तंत्र से संबद्ध सांदीपनि मुनि चरित्र स्तोत्र के अनुसार, महर्षि सांदीपनि काशी में रहते थे। एक बार प्रभास क्षेत्र से लौटते हुए वे उज्जैन आए।
- उस समय यहां कुंभ मेले का समय था। लेकिन उज्जैन में भयंकर अकाल के कारण साधु-संत बहुत परेशान थे। तब महर्षि सांदीपनि ने तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया, जिससे अकाल समाप्त हो गया।
- भगवान शिव ने महर्षि सांदीपनि से इसी स्थान पर रहकर विद्यार्थियों को शिक्षा देने के लिए कहा। महर्षि सांदीपनि ने ऐसा ही किया। आज भी उज्जैन में महर्षि सांदीपनि का आश्रम स्थित है।

कुंभ में स्नान का महत्व

सहस्त्र कार्तिके स्नानं माघे स्नान शतानि च।
वैशाखे नर्मदाकोटिः कुंभस्नानेन तत्फलम्।।
अश्वमेघ सहस्त्राणि वाजवेयशतानि च।
लक्षं प्रदक्षिणा भूम्याः कुंभस्नानेन तत्फलम्।

अर्थ- कुंभ में किए गए एक स्नान का फल कार्तिक मास में किए गए हजार स्नान, माघ मास में किए गए सौ स्नान व वैशाख मास में नर्मदा में किए गए करोड़ों स्नानों के बराबर होता है। हजारों अश्वमेघ, सौ वाजपेय यज्ञों तथा एक लाख बार पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो पुण्य मिलता है, वह कुंभ में एक स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।

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