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पत्नी और बच्चों को घर में छोड़ पति जंगल में पहुंच गया सन्यास लेने, एक साधु को गुरु बनाया, संन्यास दीक्षा से पहले गुरु ने कहा तुम संन्यास के लायक नहीं हो, तुम्हारी पत्नी संन्यास के लायक है

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2019, 11:30 AM IST

रिश्तों की गहराई को जो नहीं समझ सकता, उसे भगवान भी नहीं मिल सकता

Motivational stories in hindi story of husband and wife love and sanyas
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रिलिजन डेस्क. एक पुरानी लोक कथा है। किसी गांव में एक छोटा व्यापारी रहता था। भरा-पूरा परिवार था और व्यवसाय भी ठीक था। गांव में एस संत का आना हुआ, सप्ताह भर गांव में संत के प्रवचन हुए। व्यापारी भी रोज नियम के साथ प्रवचन सुनने जाता था। संत ने सातों दिन परमात्मा से प्रेम और संसार से वैराग्य पर प्रवचन दिया। संसार झूठ है, रिश्ते नाते सब नश्वर हैं, संसार में कोई किसी का नहीं, अंतिम सत्य परमात्मा ही है। सात दिन तक अलग-अलग उदाहरणों के साथ सुनी इन बातों ने व्यापारी के मन में घर कर लिया।

उसके मन में भी परमात्मा को पाने की इच्छा जागी। भगवान का प्रेम पाने की इच्छा जागी। घर, रिश्ते, नाते सब झूठ लगने लगे। उसकी स्थिति ये हो गई कि पत्नी और बच्चों के लिए भी कोई मोह नहीं बचा। उसने मान लिया कि वाकई ये संसार झूठ है। ईश्वर ही सत्य है। उसने पत्नी को कहा कि मैं अब संन्यास लेना चाहता हूं। संसार से मन ऊब गया है। पत्नी ने समझाया कि अभी बच्चे छोटे हैं, उन्हें जरूरत है आपकी लेकिन वो नहीं माना। हार कर पत्नी को उसकी बात माननी पड़ी।

पत्नी, बच्चों और माता-पिता आदि को घर में छोड़ व्यापारी जंगल की ओर चल दिया। उसे किसी गुरु की तलाश थी, जो उसे परमात्मा को पाने का सही रास्ता दिखा सके। घने जंगल में एक कुटिया में उसे एक साधु दिखाई दिया। उस साधु का तेज ऐसा था कि व्यापारी ने तय कर लिया कि इसे ही अपना गुरु बनाकर दीक्षा लूंगा। वो साधु की कुटिया में पहुंचा। साधु को अपना गुरु मानकर उसके चरणों में बैठ गया। उसने कहा गुरुदेव मैं संन्यास लेना चाहता हूं, मुझे परमात्मा को पाना है।

गुरु ने कहा तुम्हारी परीक्षा लूंगा कि तुम संन्यास के लायक हो भी या नहीं। कुछ सवाल पूछता हूं, सही जवाब देना। व्यापारी ने कहा जी गुरुदेव। आप पूछिए। साधु ने पूछा क्या तुम्हें अपने माता-पिता से प्रेम है, व्यापारी ने कहा नहीं है। साधु ने फिर पूछा क्या तुम्हें अपनी पत्नी और बच्चों से प्रेम है। व्यापारी ने कहा नहीं गुरुदेव, मुझे संसार में किसी से प्रेम नहीं है। सारे रिश्ते झूठे हैं। संसार भी झूठा है। मुझे इस संसार की किसी चीज से प्रेम नहीं है।

साधु ने फिर पूछा क्या तुम अपनी पत्नी को बताकर संन्यास लेने आए हो। व्यापारी ने कहा हां गुरुदेव। उसकी इच्छा से ही आया हूं। साधु ने कहा फिर तुम संन्यास के लायक नहीं हो, तुमसे ज्यादा तो संन्यास के लायक तुम्हारी पत्नी है। व्यापारी ने कहा ऐसा क्यों गुरुदेव, वो तो मोह में बंधी है, मुझे बहुत रोका, मै अपने फैसले पर अडिग रहा और संसार को छोड़कर आपकी शरण में आ गया।

साधु ने कहा, तुम्हारी समस्या ही ये है कि तुम्हें किसी से प्रेम ही नहीं है। तुम्हारे मन में प्रेम नाम की कोई चीज ही नहीं है, तुम पत्थर की तरह हो गए हो। तुम्हारे मन में प्रेम का एक बीज भी होता तो मैं उसको वृक्ष बना देता और तुम्हें परमात्मा मिल जाता लेकिन तुम तो पत्थर की तरह हो गए जिसमें कोई अंकुर नहीं फूट सकता। तुमसे बेहतर तो तुम्हारी पत्नी है जो तुमसे इतना प्रेम करती है कि तुम्हारी खुशी के लिए उसने तुम्हें संन्यास के रास्ते पर आने दिया और तुम्हारी जिम्मेदारियां खुद अपने कंधे पर ले लीं।

साधु ने समझाया जिसके मन में प्रेम का भाव और जिम्मेदारियों का एहसास नहीं है, उसे परमात्मा कभी नहीं मिला है। व्यापारी को अपनी गलती समझ आ गई। आंखों में आंसू आ गए। कुटिया से निकलकर सीधे अपने घर की ओर चल दिया।

कहानी का सार

परमात्मा को पाने के लिए संसार को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। मन में अपनों के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का भाव ईमानदारी से निभाया जाए तो परमात्मा संसार में रह कर भी मिल सकता है।

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