कंबोडिया / 1100 साल से भी ज्यादा पुराना है अंकोरवाट मंदिर 213 फीट ऊंचा है इसका शिखर

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162 हेक्टेयर में फैला है कंबोडिया का अंकोरवाट मंदिर, जिसकी तर्ज पर अयोध्या में राम मंदिर बनाने की हो रही है चर्चा

Dainik Bhaskar

Dec 03, 2019, 01:32 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क. शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के अनुसार अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर की तर्ज पर होना चाहिए। उनका कहना है कि मंदिर एक बार बनना है इसलिए इसकी विशालता और भव्यता का ध्यान रखा जाना जरूरी है। अंकोरवाट कंबोडिया में दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है। जो करीब 162.6 हेक्टेयर में फैला है। इसे मूल रूप से खमेर साम्राज्य में भगवान विष्णु के एक हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था। यह मन्दिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। मीकांग नदी के किनारे सिमरिप शहर में बना यह मंदिर आज भी संसार का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है।

  • अंकोरवाट का इतिहास

वर्तमान कंबोडिया का प्राचीन नाम कंबुज था और वहां खमेर साम्राज्य था। खमेर भाषा में अंकोर शब्द का अर्थ राजधानी होता है। अंकोर शब्द संस्कृत के नगर शब्द से बना है। इसलिए अंकोर नाम का महानगर खमेर साम्राज्य की राजधानी रहा। खमेर साम्राज्य लगभग 9वीं शताब्दी से 15वीं शताब्दी तक अपने उत्कर्ष पर था। अंकोर महानगर में वर्ष 1010 से 1220 तक के काल में बहुत बड़ी संख्या में लोग रहते थे। आज इसी जगह अंकोरवाट का मंदिर स्थित है। जो कम्बोडिया का लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। अंकोर नगर के अवशेष श्याम रीप (सिमरिप) नामक आधुनिक नगर के दक्षिण में जंगलों और खेतों के बीच है। अंकोर क्षेत्र में करीब 1000 से अधिक छोटे-बड़े मंदिर हैं। इनमें से कई मन्दिरों का पुनर्निर्माण हुआ है। अंकोरवाट मंदिर तथा अंकोरथोम सहित पूरे क्षेत्र को यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।

  • अंकोरथोम और अंकोरवाट नगर

अंकोरथोम और अंकोरवाट प्राचीन कंबुज की राजधानी है। मान्यताओं के अनुसार इस राज्य का संस्थापक कौंडिन्य ब्राह्मण था जिसका नाम वहां के संस्कृत अभिलेख में मिलता है। 9वीं शताब्दी में जयवर्मा तृतीय कंबुज का राजा बना और उसी ने लगभग 860 ईस्वी में अंकोरथोम नाम से अपनी राजधानी की शुरुअात की जो करीब 40 सालों तक बनती रही और करीब 900 ईस्वी के आसपास तैयार हुई। इसके निर्माण के संबंध में कंबुज साहित्य में कईं घटनाएं भी मिलती हैं। अंकोरथोम नगर के ठीक बीच में एक विशाल शिव मंदिर था। जो कई शिखरों से मिलकर बना हुआ था। इनमें समाधि में बैठे शिव की मूर्तियां स्थापित थीं। आज का अंकोरथोम एक विशाल नगर का खंडहर है। 

  • मंदिर के शिलाचित्रों में बताई गई है रामकथा

अंकोरवाट मंदिर बहुत विशाल है और यहां के शिलाचित्रों में रामकथा बहुत संक्षिप्त रूप में है। इन चित्रों में रावण वध से शुरुआत हुई है। इसके बाद सीता स्वयंवर का दृश्य मिलता है। इन दो प्रमुख घटनाओं के बाद विराध एवं कबंध वध का चित्रण है। फिर अगले शिलाचित्रों में भगवान श्री राम स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते हुए, सुग्रीव से श्रीराम की मैत्री, बाली-सुग्रीव युद्ध, अशोक वाटिका में हनुमान, राम-रावण युद्ध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम की अयोध्या वापसी के दृश्य देखने को मिलते हैं। इस अंकोरवाट मंदिर के गलियारों में तत्कालीन सम्राट, बलि-वामन, स्वर्ग-नरक, समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश पुराण इत्यादि से संबंधित अनेक शिलाचित्र भी दिखाई देते हैं।

  • अंकोरवाट मंदिर से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

अंकोरवाट मंदिर के निर्माण का कार्य सूर्यवर्मन द्वितीय ने शुरू किया पर वे इसे पूरा नहीं कर पाए तो इसके निर्माण का काम उनके उत्तराधिकारी धरणीन्द्रवर्मन के शासनकाल में पूरा हुआ। 

  • यह मन्दिर एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है। इसमें तीन खण्ड हैं। हर खंड में 8 गुम्बज हैं। इनमें सुन्दर मूर्तियां हैं और ऊपर के खण्ड तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां हैं। मुख्य मन्दिर तीसरे खण्ड की चौड़ी छत पर है। जिसका शिखर 213 फुट उंचा है। मन्दिर के चारों ओर पत्थर की दीवार का घेरा है जो पूर्व से पश्चिम की ओर करीब दो-तिहाई मील एवं उत्तर से दक्षिण की ओर आधे मील लंबा है। इस दीवार के बाद लगभग 700 फुट चौड़ी खाई है, जिस पर 36 फुट चौड़ा पुल है। इस पुल से पक्की सड़क मन्दिर के पहले खण्ड द्वार तक है।

  • अंकोरवाट मंदिर से जुड़े मुख्य बिंदु
  1. अंकोरवाट कंबोडिया में एक मंदिर परिसर और दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है। जो 162.6 हेक्टेयर यानी करीब 2 किलोमीटर के क्षैत्रफल में फैला हुआ है। 
  2. यह मूल रूप से खमेर साम्राज्य के लिए भगवान विष्णु के एक हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था, जो धीरे-धीरे 12 वीं शताब्दी के अंत में बौद्ध मंदिर में बदल गया। 
  3. यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम यशोधरपुर था। इसका निर्माण 1112 से 1153 ई सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय के शासनकाल में हुआ था।
  4. यह मंदिर लम्बे समय तक गुमनाम रहा। 19वीं शताब्दी के मध्य में एक फ्रांसीसी पुरातत्वविद हेनरी महोत के कारण अंकोरवाट मंदिर फिर से अस्तित्व में आया।
  5. वर्ष 1986 से लेकर वर्ष 1993 तक भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस मंदिर के संरक्षण का जिम्मा संभाला था।
  6. फ्रांस से आजादी मिलने के बाद अंकोरवाट मंदिर कंबोडिया देश का प्रतीक बन गया। राष्ट्र के लिए सम्मान के प्रतीक इस मंदिर को 1983 से कंबोडिया के राष्ट्रध्वज में भी स्थान दिया गया है।  
  7. विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में से एक होने के साथ ही यह मंदिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। 

  • कैसे पहुंचे कंबोडिया

कंबोडिया जाने के दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु से फ्लाइट मिल जाती है। वीजा की बात करें तो यहां ऑन अराइवल वीजा मिल जाएगा। इसके अलावा ई वीजा भी ले सकते हैं। भारत से जाने वाली फ्लाइट्स कंबोडिया के फनोम पेन्ह इंटरनेशनल एयरपोर्ट और सीएम रेअप इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लैंड करती हैं। एयरपोर्ट से अंगकोरवाट तक जाने के लिए बस और कैब मिलती हैं।

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