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महाशिवरात्रि / उत्तराखंड में सोनप्रयाग के पास जिस मंदिर में शिव-पार्वती विवाह हुआ था, वह अब वेडिंग डेस्टिनेशन बन रहा

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  • रुद्रप्रयाग के पास त्रियुगी नारायण मंदिर में हर साल बढ़ रही है शादियों की संख्या
  • पहले यहां सालभर में 40-50 शादियां होती थीं, इस साल यहां 100 से ज्यादा शादियां होने का अनुमान
  • यहां विष्णु ने कराई थी शिव-पार्वती की शादी, उनके फेरों की अग्नि आज भी मंदिर में जागृत है

शशिकांत साल्वी

शशिकांत साल्वी

Feb 21, 2020, 03:37 PM IST

देहरादून. महाशिवरात्रि भगवान शिव और पार्वती के विवाह का उत्सव माना जाता है। पौराणिक मान्यताएं हैं कि उत्तराखंड के सोनप्रयाग के पास मौजूद त्रियुगी नारायण मंदिर में भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती विवाह कराया था। ये मंदिर अब धीरे-धीरे वेडिंग डेस्टिनेशन बनता जा रहा है। हर विवाह मुहूर्त पर यहां 3-4 शादियां होती हैं। देशभर से लोग यहां शादी के लिए पहुंच रहे हैं। इस साल से यहां नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। विदेश से भी लोग शादी के लिए यहां आ रहे हैं। 29 फरवरी को यहां एक विदेशी लड़के की शादी गाजियाबाद की लड़की से हो रही है। स्थानीय प्रशासन और समितियां इसे अब बड़े वेडिंग डेस्टिनेशन में बदलना चाह रही हैं।

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के गांव त्रियुगी नारायण के इस मंदिर की खास बात ये है कि ये भगवान विष्णु और लक्ष्मी का मंदिर है, लेकिन इसकी मान्यता शिव-पार्वती विवाह को लेकर ज्यादा है। इसी विशेषता के कारण यहां लोग आते हैं। मंदिर में एक अखंड धूनी है, जिसे लेकर कहा जाता है कि ये वही अग्नि है जिसके फेरे शिव-पार्वती ने लिए थे। आज भी उनके फेरों की अग्नि धूनि के रूप में जागृत है। मान्यता है कि यहां शादी करने पर वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। पति-पत्नी के बीच आजीवन प्रेम और समर्पण का भाव बना रहता है।

प्रशासन ने बनवाई है मंदिर की डॉक्यूमेंट्री

मंदिर में आने वाले वर वधू के लिए डॉक्युमेंटेशन करने वाले और पांडवास क्रिएशन के डायरेक्टर सलिल डोभाल के अनुसार यहां विवाह के हर मुहूर्त पर शादियां होती हैं, कभी-कभी विवाह करने वालों की संख्या इतनी होती है कि एक के बाद एक रस्में करानी पड़ती हैं। पांडव क्रिएशन ने गढ़वाल मंडल विकास निगम, उत्तराखंड टूरिज्म डिपार्टमेंट और रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन के लिए त्रियुगी नारायण मंदिर की डॉक्यूमेंट्री बनाई है। खबर में दिया गया वीडियो इसी डॉक्यूमेंट्री से लिया गया है।

पिछले दो सालों में आंकड़ा दोगुना हुआ

गढ़वाल मंडल विकास निगम में टूरिस्ट प्लेसेस के प्रभारी संजय भट्ट के अनुसार त्रियुगी नारायण मंदिर में शादी के लिए देश-दुनिया से लोग आ रहे हैं। पिछले एक-दो साल में यहां आने वाले लोगों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पहले यहां 40-50 शादियां सालभर में हो जाती थीं, लेकिन अब ये संख्या बढ़ रही है। 2020 में यहां 100 से ज्यादा शादियां होने का अनुमान है। यहां 29 फरवरी को शादी होना है, जिसमें लड़का विदेश से आ रहा है और लड़की गाजियाबाद की है।

एक कपल जिसने त्रियुगी नारायण मंदिर में विवाह किया।

यहां 1100 रुपए में हो सकता है विवाह

सलिल डोभाल के अनुसार मंदिर में 1100 रुपए की दक्षिणा देकर भी विवाह हो सकता है। इन पैसों से मंदिर के पुजारी विवाह से जुड़ी सामग्री उपलब्ध करवाते हैं, विवाह करवाते हैं और अन्य रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। जो लोग अपनी शादी को भव्य बनाना चाहते हैं, वे यहां 11 हजार से 21 हजार रुपए तक भी दक्षिणा के रूप में मंदिर में दान देते हैं। यहां कपल्स और अन्य मेहमानों के ठहरने के लिए कई गेस्ट हाउस और होटल्स हैं। यहां गढ़वाल मंडल विकास निगम का होटल में भी है, जहां अपने बजट के हिसाब से रहने की जगह बुक की जा सकती है। कहा जा सकता है कि 11 हजार से लाखों तक के बजट में शादी के आयोजन की यहां व्यवस्था है।

क्यों कहते हैं त्रियुगी नारायण मंदिर

इस मंदिर में स्थित अखंड धूनी के बारे में मान्यता है कि ये तीन युगों से अखंड जल रही है। इसी वजह से इसे त्रियुगी मंदिर कहते हैं। ये मुख्य रूप से नारायण यानी भगवान विष्णु और लक्ष्मी का मंदिर है, लेकिन यहां शिव-पार्वती का विवाह हुआ था, इस कारण मंदिर में शिवजी और विष्णुजी के भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

ये है शिव-पार्वती के विवाह की संक्षिप्त कथा

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार त्रेता युग में देवी सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ कुंड में कूदकर प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद देवी ने पार्वती के रूप में जन्म लिया था। पार्वती ने कठोर तप करके भगवान शिव को प्रसन्न किया और विवाह करने का वरदान मांगा। तब भगवान विष्णु ने पार्वती और शिवजी का विवाह इसी जगह करवाया था। इस मंदिर का स्वरूप केदारनाथ धाम के मंदिर जैसा है।

अखंड धूनी के पास ही हुआ था शिव-पार्वती का विवाह

यहां एक कुंड में अखंड धूनी जलती रहती है। गांव के लोगों का मानना है कि इसी स्थान पर शिव-पार्वती बैठे थे। अग्नि कुंड के चारों तरफ इन्होंने फेरे लिए थे। मंदिर आने वाले भक्त यहां भेंट में लकड़ियां अर्पित करते हैं। जाते समय मंदिर से अखंड धूनी की राख प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं।

यहां हैं प्राचीन कुंड

शिव पार्वती के विवाह में ब्रह्माजी ने पुरोहित की भूमिका निभाई थी। विवाह में शामिल होने पहले ब्रह्माजी ने एक कुंड में स्‍नान किया था, जिसे ब्रह्मकुंड कहा जाता है। यहां भगवान विष्णु ने पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी। एक कुंड विष्णुजी के नाम का भी है। एक अन्य कुंड का नाम रुद्र कुंड है। यहां विवाह में आए अन्य देवी-देवताओं ने स्नान किया था।

कैसे पहुंच सकते हैं इस मंदिर तक

देशभर से रुद्रप्रयाग पहुंचने के लिए कई साधन आसानी से मिल सकते हैं। रुद्रप्रयाग से सोनप्रयाग पहुंचना होगा। अगस्त्यमुनि से गुप्तकाशी की फिर सोनप्रयाग आता है। यहां से त्रियुगी नारायण मंदिर आसानी से पहुंच सकते हैं।

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