गीता जयंती / कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को दिए श्रीकृष्ण के ज्ञान में में छिपे हैं मैनेजमेंट सूत्र

Management Formulas Of Geeta Shri Krishna given Geeta Gyan to Arjuna  in the Kurukshetra
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Management Formulas Of Geeta Shri Krishna given Geeta Gyan to Arjuna  in the Kurukshetra

माना जाता है मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया गीता का ज्ञान

Dainik Bhaskar

Dec 04, 2019, 01:36 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क. गीता जयंती हर साल मार्गशीर्ष माह के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के उपदेश दिए थे। इस बार ये पर्व 8 दिसंबर रविवार को पड़ रहा है। महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिए थे, इनमें  मैनेजमेंट के सूत्र छिपे हुए हैं। जिनको समझकर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में छोटे-छोटे बदलावों से उन्नति कर सकता है।

गीता के उपदेश

  • श्रेष्ठ का अनुसरण 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। 

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।। 

अर्थ - श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं। 

मैनेजमेंट सूत्र: श्रेष्ठ पुरुष को सदैव पद व गरीमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, वह जैसा करेंगे, सामान्य मनुष्य उसकी नकल करेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर कोई अधिकार पूरी मेहनत से काम करते हैं तो उसके कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे। 

  • व्यवहार का प्रतिफल 

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। 

मम व्रत्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।

अर्थ - हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं।

मैनेजमेंट सूत्र: संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष मिलता है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। 

  • कर्तव्य केंद्रित 

योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय। 

सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। 

अर्थ - हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं। 

मैनेजमेंट सूत्र - धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य पर टिकाकर काम करना चाहिए। 

  • भावनात्मक रहना 

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। 

न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।।

अर्थ - योगरहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि और भावना नहीं होती। ऐसे भावनारहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा। 

मैनेजमेंट सूत्र -  सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना (आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।

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