एकाग्रता के बिना की गई पूजा नहीं होती है सफल, निस्वार्थ भाव से करना चाहिए भगवान का ध्यान

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
  • संत नाक बंद करके कुछ क्रियाएं कर रहे थे, क्रिया पूरी होने के बाद एक ग्वाले ने इस बारे में पूछा तो संत ने कहा कि मैं भगवान से बातें कर रहा था, ये सुनकर ग्वाले ने भी शुरू कर दी वही क्रिया
  • संत ने कहा कि मैं भगवान शिव से बातें कर रहा था। ग्वाले ने पूछा कि क्या ऐसे करने से भगवान से बातें हो जाती हैं? संत समझ गए कि ग्वाला बहुत भोला है, उसका मन बहलाने के लिए वे बोलें कि हां, ऐसा करने भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। ये बोलकर संत वहां से आगे बढ़ गए।
  • संत के जाने के बाद ग्वाले ने सोचा कि अगर इस ये क्रिया करने से भगवान से बात होती है तो मैं भी भगवान से बात जरूर करूंगा। ये सोचकर उसने भी वही क्रिया करना शुरू कर दिया। ग्वाले को क्रिया करनी नहीं आती थी, उसने जोर से नाक दबा ली, सांस लेने में उसे परेशानी हो रही थी, कुछ ही देर में उसकी ऐसी स्थिति हो गई कि वह मरने ही वाला है। उसका पूरा ध्यान भगवान की ओर था, उसे भगवान से बात करनी थी। तभी वहां भगवान शिव प्रकट हो गए। शिवजी ने कहा कि वत्स आंखें खोलो, तुम्हारी तपस्या पूरी हो गई है।
  • ग्वाले ने आंखें खोली तो सामने शिवजी खड़े थे, लेकिन उसने शिवजी को कभी देखा नहीं था, वह उन्हें पहचानता नहीं था। इस वजह से उसने शिवजी को एक पेड़ से बांध दिया और संत को खोजने के लिए दौड़ पड़ा। इस पूरे प्रसंग को ज्यादा समय नहीं हुआ था। इस कारण वह संत ग्वाले को मिल गए। ग्वाले ने पूरी बात संत को बता दी। संत भी हैरान हो गए, वे तुरंत ही दौड़कर उस पेड़ के पास पहुंच गए, लेकिन संत को वहां दिखाई नहीं दिया।
  • संत ने कहा कि पेड़ पर तो कोई दिखाई नहीं दे रहा है, ग्वाला बोला कि महाराज ध्यान से देखें। संत को अभी भी नहीं दिख रहे थे। ग्वाले ने भगवान से ही इसका कारण पूछा। भगवान ने कहा कि मेरे दर्शन सिर्फ उन्हीं को हो सकते हैं, जिनकी भक्ति सच्ची है। संत को भगवान नहीं दिख रहे थे, लेकिन ये बात सुनाई दी। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने भगवान से क्षमा याचना की। ग्वाले ने भगवान से संत को क्षमा करने की बात कही। भगवान ने सच्चे भक्त की बात मान ली और संत को भी दर्शन दिए। इसके बाद भगवान अंर्तध्यान हो गए।