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सीता अष्टमी विशेष: श्रीराम और सीता बिना कुछ कहे समझ लेते थे एक-दूसरे के मन की बात

एक वर्ष पहले
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जीवन मंत्र डेस्क. रविवार, 15 फरवरी को फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी है, इसे सीता अष्टमी कहा जाता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य और श्रीराम कथाकार पं. मनीष शर्मा के अनुसार मान्यता है कि त्रेता युग में इसी तिथि पर देवी सीता धरती पर प्रकट हुई थीं। इस अवसर पर जानिए श्रीराम और सीता से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग, जिसमें सुखी वैवाहिक जीवन के सूत्र छिपे हैं...
श्रीरामचरित मानस में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए निकले तो रास्ते में उन्हें गंगा नदी पार करना थी। तब नाव के केवट ने श्रीराम के पैर धोने की बाद कही तो श्रीराम भी इस बात के लिए राजी हो गए। केवट ने श्रीराम के पैर धोए। इसके बाद केवट ने श्रीराम, लक्ष्मण, सीता को अपनी नाव में बैठाकर गंगा नदी पार करवा दी। नदी के दूसरे किनारे पर पहुंचकर श्रीराम और सभी नाव से उतरे तो श्रीराम के मन में कुछ संकोच हुआ।
इस संबंध में श्रीरामचरित मानस में लिखा है कि -

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।

कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।
इस दोहे का सरल अर्थ यह है कि जब सीता ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच देखा तो सीता ने तुरंत ही अपनी अंगूठी उतारकर उस केवट को भेंट स्वरूप देनी चाही, लेकिन केवट ने अंगूठी नहीं ली। केवट ने कहा कि वनवास पूरा करने के बाद लौटते समय आप मुझे जो भी देंगे मैं उसे प्रसाद समझकर स्वीकार कर लूंगा।

प्रसंग का संदेश
इस प्रसंग का संदेश यह है कि पति और पत्नी के लिए एक गहरा संदेश छिपा हुआ है। इस संदेश को समझ लेने पर वैवाहिक जीवन में किसी भी प्रकार परेशानियां नहीं आती हैं और आपसी तालमेल बना रहता है।
जब सीता ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच के भाव देखे तो उन्होंने समझ लिया कि वे केवट को कुछ भेंट देना चाहते हैं, लेकिन उनके पास देने के लिए कुछ नहीं था। यह बात समझते ही सीता ने अपनी अंगूठी उतारकर केवट को देने के लिए आगे कर दी। पति और पत्नी के बीच ठीक इसी प्रकार की समझ होनी चाहिए। 

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