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कृष्ण जन्माष्टमी पर कुछ ऐसे करें आरती, जानिए पूरी विधि और फल

Krishna Ji Ki Aarti: जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की आरती करनी चाहिए। आरती के बाद माखन मिश्री का भोग लगाना चाहिए।
कृष्ण जन्माष्टमी पर कुछ ऐसे करें आरती, जानिए पूरी विधि और फल
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कृष्ण जन्माष्टमी पर कुछ ऐसे करें आरती, जानिए पूरी विधि और फल

Dainik Bhaskar

Sep 03, 2018, 01:55 PM IST

रिलीजन डेस्क. जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की आरती करनी चाहिए। श्रीकृष्ण को कुंज बिहारी, बांके बिहारी, नंदलाल, गिरधर और मुरारी जैसे कई नामों से पूजा जाता है। इनको भगवान विष्णु का अवतार भी माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की आरती करने से पति-पत्नी में प्रेम बढ़ता है। जिन माताओं को पुत्र नहीं है उन्हे इस आरती से पुत्र प्राप्ति भी हो सकती है। भगवान श्रीकृष्ण की आरती करने के बाद माखन और मिश्री का भोग लगाना चाहिए और लोगों में बांटना चाहिए। ऐसा करने से मनोवांछित फल मिलता है।

जन्माष्टमी पर कुछ ऐसे करें आरती -

- कृष्ण भगवान की आरती करने से पहले पूर्व दिशा में उपर की ओर मुंह रखकर 3 बार शंख बजाना चाहिए। इसके बाद एक लय में घंटी, झांझ, मझीरा, तबला, हारमोनियम आदी वाद्य यंत्रों के साथ ताली बजाएं।

- आरती का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। जल्दी-जल्दी आरती नहीं करनी चाहिए। आरती के लिए शुद्ध कपास यानी रूई से बनी घी की बत्ती होनी चाहिए। तेल की बत्ती का उपयोग करने से बचना चाहिए। कपूर आरती भी की जाती है। बत्तियाें की संख्या एक, पांच, नौ, ग्यारह या इक्किस हो सकती है। आरती घड़ी के कांटो की दिशा में लयबद्ध तरीके से क रनी चाहिए।

आरती शुरू करने से पहले बोले ये मंत्र - 

कस्तूरी तिलकं ललाट पटले, वक्षस्थले कौस्तुभं। 

नासाग्रे वरमौक्त्तिकं करतले, वेणुर् करे कङणम्। 
सर्वाङे हरि चन्दनं सुललितं, कण्ठे च मुक्तावली। 
गोपस्त्रीपरिवेष्ठितो विजयते, गोपाल चूड़ामणिम्।

आरती श्री कुंज बिहारी की - 

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की।

गले में बैजन्ती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।

श्रवन में कुंडल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।।
नैनन बीच, बसहि उरबीच, सुरतिया रूप उजारी की ।। 
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।

लतन में ठाढ़ै बनमाली, भ्रमर सी अलक।

कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक, ललित छबि श्यामा प्यारी की।।

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की।

कनकमय मोर मुकट बिलसे, देवता दरसन को तरसे।

गगनसों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग मधुर मिरदंग।।

ग्वालनी संग, अतुल रति गोप कुमारी की।।

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की।

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्री गंगै

स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस जटाके बीच।

हरै अघ कीच, चरन छबि श्री बनवारी की।।

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की।

चमकती उज्जवल तट रेनू, बज रही वृन्दावन बेनू।

चहुं दिसि गोपी ग्वाल धेनू, हसत मृदु मंद चांदनी चंद ।

कटत भव फंद, टेर सुनु दीन भिखारी की।।

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की।

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