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नवरात्रि में हर दिन कैसे करें पूजा, जानिए कौन-सी देवि को क्या प्रसाद चढ़ाएं

Navaratri 2018: Poojan Vidhi for Navratra 9 Days, नवरात्रि में हर दिन अलग-अलग देवि की पूजा की जाती है।

Dainik Bhaskar

Oct 13, 2018, 11:53 AM IST
Navaratri 2018: Poojan Vidhi for Navratra 9 Days, Navratra 9 Devi Prasad and Dresses

आज नवरात्रि का पहला दिन है। प्रतिपदा और द्वितिया तिथि होने से आज माता शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी दोनों की पूजा होगी। इसके बाद 19 अक्टूबर तक लाइनवार एक-एक दिन चंद्रघंटा, कुंष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री देवी की पूजा होगी। इन नौ देवियों की पूजा इनके रुप और गुणों के अनुसार हर दिन अलग मंत्र और सामग्री से होती है। इनका प्रसाद भी हर दिन अलग होता है। नवरात्रि में इस तरह हर दिन पूजा करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं। जिससे हर तरह के दुख दूर हो जाते हैं।

जानिए कैसे करें नौ देवियों की पूजा -

1. शैलपुत्री

मां शैलपुत्री की पूजा नवरात्रि के पहले दिन होती है। शैलपुत्री देवी के नौ अवतारों में से सबसे पहला रूप है। शैल संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ होता है पर्वत और पुत्री यानि बेटी। इसका पूरा अर्थ हुआ हिमालय की पुत्री। देवी शैलपुत्री ब्रह्मा, विष्णु और शिव की शक्तियों का प्रतीक हैं। ये बैल पर विराजित है। उनके दाहिने हाथ में शूल है और बाएं हाथ में बहुत सारे फूल हैं। पूर्व जन्म में माता शैलपुत्री दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थी। जो कि बचपन से ही भगवान शिव को समर्पित थी। जिसके बाद, सती का भगवान शिव के साथ विवाह हुआ।

कैसे करें पूजा -

सबसे पहले गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। फिर चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें। इसके बाद चौकी (बाजोट) पर माता शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। फिर वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों से मां शैलपुत्री की षोडशोपचार पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। इसके बाद प्रसाद बांट दें।

इन मंत्रों से करें पूजा -

1 - वन्दे वांछित लाभाय चन्द्राद्र्वकृतशेखराम्।

वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

2 - ऊँ साम शैलपुत्रये नमः। इस मंत्र का 108 बार जाप करें।

प्रसाद - केला और अन्य फल, शहद या गुड़, घी-शक्कर

2. ब्रह्मचारिणी

नवरात्रि में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए माता ब्रह्मचारिणी की पूजा करनी चाहिए। देवि के एक हाथ में जप की माला और दूसरे दिन हाथ में कमंडल होता है। उनके वस्त्र तपस्वियों जैसे हैं। इनके दाहिने हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में कमण्डल हैं। देवि ब्रह्मचारिणी पर्वतराज हिमालय और मैना की पुत्री हैं, जिन्होंने भगवान नारद के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठिन तपस्या की, जिससे खुश होकर ब्रह्माजी ने इन्हे मनोवांछित वरदान दिया जिसके प्रभाव से ये भगवान शिव की पत्नी बनीं। मां ने हिमालय राजा के घर में बेटी के रूप में जन्म लिया था। भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने घोर तपस्या की। हजारों वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उन्हें भगवान शंकर पति रूप में प्राप्त हुए। देवताओं ने भी मां के इस रूप की प्रशंसा की और कहा कि ऐसी घोर तपस्या कभी किसी ने नहीं की होगी।

ऐसे करें पूजा -

देवी ब्रह्मचारिणी को पंचामृत से स्नान कराए। वस्र आदि भेंट करें। सफेद फूल चढ़ाएं। फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से करें। उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें। देवी को प्रसाद अर्पित करें। प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारीभेंट करें। आखिरी में क्षमा प्रार्थना करें। देवि ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से लाभ मिलता है। इनकी पूजा करने से, सफलता और जीत मिलती है।

मंत्र -
-
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

- दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

- ऊँ ब्रह्म ब्रह्मचारीणै नमः। इस मंत्र का 108 बार जाप करें।

प्रसाद - शक्कर और बिना नमक का मक्खन

3. चंद्रघंटा

नवरात्रि 2018 में देवि चंद्रघंटा की पूजा 11 अक्टूबर को होगी। माता चंद्रघंटा का रूप बहुत ही सौम्य है। देवि को सुगंध प्रिय है। सिंह पर सवार माता के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र है, इसलिए माता को चंद्रघंटा नाम दिया गया है। मां का शरीर सोने के समान कांतिवान है। उनकी दस भुजाएं हैं और दसों भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र हैं। कलश स्थापना की जगह मां की पूजन का संकल्प लें। देवि के हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल , तलवार , त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र धारण किए हुए हैं। इनके कंठ में सफेद पुष्प की माला और रत्नजड़ित मुकुट शीर्ष पर विराजमान है।

कैसे करें पूजा -

वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां चंद्रघंटा की पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधितद्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्रपुष्पांजलि आदि करें।

पूजा का फल -

मां चंद्रघंटा के आशीर्वाद से भक्त से सभी पाप नष्ट हो जाते है और उसकी राह में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती है। इस देवी की पूजा करने से, सभी दुखों और भय से मुक्ति मिलती है। मां चंद्रघंटा अपने भक्तों को असीम शांति और सुख सम्पदा का वरदान देती है।

इन मंत्रों से करें पूजा -

- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

- पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।

- ऊँ चं चं चं चंद्रघंटायेः ह्रीं नम:। इस मंत्र का 108 बार जाप करें।

प्रसाद - शहद, मावे की मिठाई, दूध, खीर और दूध से बनी मिठाईयां।

4. देवि कुष्मांडा

नवरात्रि के चौथे दिन कुष्मांडा माता की पूजा की जाती है। देवि पुराण के अनुसार जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब कुष्माण्डा देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अपनी मंद-मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने के कारण ही इन्हें कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। इनकी आठ भुजाएं हैं। इसलिए अष्टभुजा देवी के नाम से भी इनको जाना जाता है। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है।

अष्टभुजाधारी माता कुष्मांडा शेर पर सवार रहती हैं। देवि कुष्मांडा का निवास सूर्य मंडल में होता है। माता के हाथ में पुष्प, चक्र, गदा, वर देती हुई मुद्रा, जप माला और अमृत घड़ा रहता है। कुम्हड़ा यानी कद्दू की बलि दी जाती है।

एेसे करेें पूजा -

नवरात्रि के चौथे दिन मां की पूजा हरे रंग के कपड़े पहनकर करने का विधान है। मां के लिए ऊं कुष्मांडा देव्यै नम: मंत्र का जाप किया जाना चाहिए। वहीं सिद्ध कुंजिका स्रोत का पाठ करना नवरात्रि में लाभ दायक है। कुंष्मांडा देवि को गंगाजल, पंचामृत और फिर शुद्ध जल से स्नान करवाएं। इसके बाद वस्त्र चढ़ाएं। फिर कुमकुम, हल्दी, मेहंदी सहित अन्य सौभाग्य सामग्री चढाएं। इसके बाद इत्र और अन्य सुगंधित चीजें चढ़ाकर मिठाई का नैवेद्य लगाएं। फिर आरती करें और प्रसाद बांट दें।

देवी कुष्मांडा की पूजा का फल -

मां कुष्मांडा की पूजा करने से भक्त को अपने सभी दुखों और तकलीफों से मुक्ति मिल जाती है। इसके अलावा उसे दीर्घायु, प्रसिद्धि, ताकत और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है। इनकी कृपा से हर तरह के रोग-शोक दूर हो जाते हैं। अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मनुष्य भाग्यशाली बन जाता है।

मंत्र -

ॐ देवी कुष्मांडायै नमः , इस मंत्र का 108 बार जाप करें।

सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

प्रसाद - पेठा, मालपुआ, दूध पाक, का भोग लगाएं। इसके बाद प्रसाद को किसी ब्राह्मण को दान कर दें और खुद भी खाएं।

5. स्कंदमाता

नवरात्रि में स्कंदमाता की पूजा 13 अक्टूबर यानी आज होगी। देवी स्कंदमाता वात्सल्य की मूर्ति है। पौराणिक कथा के अनुसार जब इंद्र कार्तिकेय को परेशान कर रहे थे, तब मां ने उग्र रूप धारण कर लिया। चार भुजा और शेर पर सवार मां प्रकट हुई। मां ने कार्तिकेय को गोद में उठा लिया। इसके बाद इंद्र आदि देवताओं ने मां की स्कंदमाता के रूप में आराधना की। माता के इस रूप की पूजा करने वालों को किसी तरह की हानि कोई भी व्यक्ति नहीं पहुंचा सकता। इस दिन कार्तिकेय की पूजा का भी विधान है।

देवी स्कन्दमाता की तीन आंखें और चार भुजाएं हैं। स्कंदमाता अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करती हैं और एक भुजा में भगवान स्कन्द या कुमार कार्तिकेय को सहारा देकर अपनी गोद में लिये बैठी हैं जबकि मां का चौथा हाथ भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा मे होता है। ऐसा कहा जाता है कि मां स्कंदमाता की पूजा करने से, मूर्ख व्यक्ति भी ज्ञानी या बुद्धिमान बन सकता है।

कैसे करें पूजा -

देवि स्कंदमाता की पूजा में लाल फूल, लाल वस्त्र, घी का दीपक और अन्य सुगंधित और सौभाग्य सामग्री होनी चाहिए। माता की पूजा से पहले स्कंद कुमार यानी कार्तिकेय जी की पूजा करनी चाहिए। फिर देवि स्कंदमाता को पंचामृत और गंगाजल से स्नान करवाएं। इसके बाद सुगंधित चीजें और सौभा‌ग्य सामग्रियों से माता की पूजा करें। चंदन, कुमकुम, लाल फूल और हल्दी, मेहंदी माता को चढ़ाएं। इसके बाद फल और मिठाई का नैवेद्य लगाएं। फिर आरती करें और प्रसाद बांट दें।

पूजा का फल -

स्कंदमाता की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कामकाज की रुकावटें भी खत्म होती हैं। स्कंदमाता की आराधना से संतान सुख मिलता है। नवरात्रि के पांचवें दिन लाल चुनरी, पांच तरह के फल, सुहाग का सामान और गेहूं या चावल से मां की गोद भरनी चाहिए। इससे मां खुश होती हैं और भक्तों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देती है।

मंत्र -

- सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥

- या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

- ॐ ह्रीं सः स्कंदमात्रैय नमः , इस मंत्र का 108 बार जाप करें।

प्रसाद - केसर, पिश्ता, ड्रायफ्रूट्स और खीर

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