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नवरात्रि 2018: बगलामुखी मंत्र और आरती, इनके प्रभाव से मिलती है दुश्मनों पर जीत और कोर्ट केस में सफलता

Baglamukhi Mantra And Aarti: बगलामुखी देवी की पूजा से दुश्मनों पर जीत हासिल होती है।

Dainik Bhaskar

Oct 09, 2018, 02:00 PM IST
Navratri 2018 Chant Baglamukhi Mantra Baglamukhi Mata Aarti for Success Over Enemies

बगलामुखी देवी ब्रहमांड की दस सर्वश्रेष्ठ शक्तियों में से एक है। ये दस महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या हैं। इन्हें पीताम्बरा भी कहा जाता है। ये कलयुग की अधिष्ठात्री देवी हैं। कलयुग में इनकी पूजा करने से तुरंत फल मिलता है। बगलामुखी देवी इस ब्रहमांड की स्तम्भन शक्ति हैं। इनकी पूजा दुश्मनों पर जीत हासिल करने के लिए की जाती है। खासतौर से कोर्ट-कचहरी और पुलिस के मामलों में उलझे निर्दोष लोग बगलामुखी देवी के मंत्र जपकर परेशानियाें से मुक्त हो सकते हैं।

ये है बगलामुखी मंत्र -

ऊं ह्ललीं बगलामुखीं सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय, जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं विनाशय ह्ललीं ऊं स्वाहा

इस मंत्र का जप करने से अचानक परेशानियां नहीं आती है और हार का सामना भी नहीं करना पड़ता। इस मंत्र का जप करने वाले लोगों की कोशिश बेकार नहीं जाती। जल्दी ही सफलता मिलती है। वहीं झूठे इस मंत्र के प्रभाव से झूठे आरोप में कोर्ट केस में फंसे लोगों को दुश्मनों पर जीत मिलती है। ऐसे लोगों को दुश्मन भी परेशान नहीं करते।

बगलामुखी देवी की आरती -

जय जयति सुखदा, सिद्धिदा, सर्वार्थ – साधक शंकरी।
स्वाहा, स्वधा, सिद्धा, शुभा, दुर्गानमो सर्वेश्वरी ।।
जय सृष्टि-स्थिति-कारिणि-संहारिणि साध्या सुखी।
शरणागतो-अहं त्राहि माम् , मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

जय प्रकृति-पुरूषात्मक-जगत-कारण-करणि आनन्दिनी।

विद्या-अविद्या, सादि-कादि, अनादि ब्रह्म-स्वरूपिणी।।
ऐश्वर्य-आत्मा-भाव-अष्टम, अंग परमात्मा सखी।
शरणागतो-अहं त्राहि माम्, मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

जय पंच-प्राण-प्रदा-मुदा, अज्ञान-ब्रह्म-प्रकाशिका।
संज्ञान-धृति-अज्ञान-मति-विज्ञान-शक्तिविधायिका ।।
जय सप्त-व्याहृति-रूप, ब्रह्म विभू ति शशी-मुखी ।
शरणागतो अहं त्राहि माम्, मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

आपत्ति-अम्बुधि अगम अम्ब! अनाथ आश्रयहीन मैं।
पतवार श्वास-प्रश्वास क्षीण, सुषुप्त तन-मन दीन मैं।।
षड्-रिपु-तरंगित पंच-विष-नद, पंच-भय-भीता दुखी।
शरणागतो अहं त्राहि माम्, मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

जय परमज्योतिर्मय शुभम् , ज्योति परा अपरा परा।
नैका, एका, अनजा, अजा, मन-वाक्-बुद्धि-अगोचरा।।
पाशांकुशा, पीतासना, पीताम्बरा, पंकजमुखी।
शरणागतो अहं त्राहि माम्, मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

भव-ताप-रति-गति-मति-कुमति, कर्त्तव्य कानन अति घना।
अज्ञान-दावानल प्रबल संकट विकल मन अनमना।।
दुर्भाग्य-घन-हरि, पीत-पट-विदयुत झरो करूणा अमी।
शरणागतो अहं त्राहि माम्, मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

हिय-पाप पीत-पयोधि में, प्रकटो जननि पीताम्बरा!।
तन-मन सकल व्याकुल विकल, त्रय-ताप-वायु भयंकरा।।
अन्तःकरण दश इन्द्रियां, मम देह देवि! चतुर्दशी।
शरणागतो अहं त्राहि माम्, मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

दारिद्रय-दग्ध-क्रिया, कुटिल-श्रद्धा, प्रज्वलित वासना। वासना।
अभिमान-ग्रन्थित-भक्तिहार, विकारमय मम साधना।।
अज्ञान-ध्यान, विचार-चंचल, वृत्ति वैभव-उन्मुखी।
शरणागतो अहं त्राहि माम्, मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

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