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छठ व्रत / संतान प्राप्ति और उसकी लंबी उम्र के लिए की जाती है सूर्य पूजा, ये है पूजन विधि



poojan vidhi for chhath pooja
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poojan vidhi for chhath pooja

Dainik Bhaskar

Nov 13, 2018, 01:28 PM IST

रिलिजन डेस्क. कार्तिक मास में भगवान सूर्य की पूजा की परंपरा है, शुक्ल पक्ष में षष्ठी तिथि को छठ पूजा  का विशेष महत्व है। कार्तिक मास में सूर्य अपनी नीच राशि में होता है अतः सूर्य देव की विशेष उपासना की जाती है, ताकि स्वास्थ्य की समस्यों सं बचा जा सके। षष्ठी तिथि का सम्बन्ध संतान की आयु से होता है। अतः सूर्य देव और षष्ठी की पूजा से संतान प्राप्ति और और उसकी आयु रक्षा दोनों हो जाती हैं। इस बार छठ पूजा 13 नवंबर को की जाएगी। लेकिन इस पूजा की शुरूआत 11 नवंबर से होगी।

आइए जानते हैं पूजन विधि और इससे जुड़ी खास बातें...

  1. छठ की पूजा विधि क्या है?

    इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होती है और सप्तमी को अरुण वेला में इस व्रत का समापन होता है।

     

    • कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को "नहा-खा" के साथ इस व्रत की शुरुआत होती है। इस दिन से स्वच्छता की स्थिति अच्छी रखी जाती है। इस दिन लौकी और चावल का आहार ग्रहण किया जाता है।
    • दूसरे दिन को "लोहंडा-खरना" कहा जाता है। इस दिन उपवास रखकर शाम को खीर का सेवन किया जाता है। खीर गन्ने के रस की बनी होती है। इसमें नमक या चीनी का प्रयोग नहीं होता।
    • तीसरे दिन उपवास रखकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। साथ में विशेष प्रकार का पकवान "ठेकुवा" और मौसमी फल चढाएं. अर्घ्य दूध और जल से दिया जाता है।
    • चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अंतिम अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद कच्चे दूध और प्रसाद को खाकर व्रत का समापन किया जाता है।
    • इस बार पहला अर्घ्य 13 नवंबर को संध्या काल में दिया जाएगा और अंतिम अर्घ्य 14 नवंबर को अरुणोदय में दिया जाएगा।

  2. व्रत के लाभ

    जिन लोगों को संतान न हो रही हो या संतान होकर बार-बार समाप्त हो जाती हो ऐसे लोगों को इस व्रत से लाभ होता है।

     

    • अगर संतान को स्वास्थ्य संबंधी समस्या हाे तो ये व्रत लाभदायक होता है।
    • जिन लोगों की कुंडली में सूर्य की स्थिति ख़राब हो या राज्य पक्ष से समस्या हो ऐसे लोगों को भी इस व्रत को जरूर रखना चाहिए।

  3. कौन हैं छठी मैया

    षष्‍ठी देवी को ही स्‍थानीय बोली में छठ मैया कहा गया है। षष्‍ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं, संतान को दीर्घायु प्रदान करती हैं।

     

    • बच्चों की रक्षा करना भी इनका स्वाभाविक गुण धर्म है। इन्हें विष्णुमाया तथा बालदा अर्थात पुत्र देने वाली भी कहा गया है। 
    • कहा जाता है कि जन्म के छठे दिन जो छठी मनाई जाती हैं वो इन्हीं षष्ठी देवी की पूजा की जाती है। यह अपना अभूतपूर्व वात्सल्य छोटे बच्चों को प्रदान करती हैं। 
    • हिंदू पुराणों के अनुसार मां छठी को कात्यायनी नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि की षष्ठी तिथ‍ि को इन्‍हीं की पूजा की जाती है।  
       

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