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दो ब्रह्मचारी साधु नदी के किनारे खड़े थे, दूसरे किनारे पर एक युवती थी, उसे नदी पार करना थी लेकिन नाव नहीं थी, एक ब्रह्मचारी ने उसे पीठ पर लाद कर नदी पार करा दी, दूसरे ने उससे कहा कि तुमने नारी को छुआ है, ये पाप है...

Dainik Bhaskar

Feb 15, 2019, 12:11 PM IST

पाप और पुण्य का सही पैमाना क्या है? ये समझना जरूरी है

Motivational stories in hindi Motivational story story of two sadhu and one woman
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रिलिजन डेस्क. एक पुरानी लोककथा है। किसी नगर के बाहर एक आश्रम था। वो ब्रह्मचारी साधुओं का था। वहां महिलाओं का प्रवेश भी वर्जित था। सारे ब्रह्मचारी साधुओं को ये सख्त हिदायत दी जाती थी कि नारी से दूर रहें। उन्हें छुए नहीं ताकि मन में कोई काम भावना जागे। सभी ब्रह्मचारी साधु इसका पूरी इमानदारी से पालन भी करते थे। इस आश्रम के साधुओं की ख्याति पूरे नगर में थी। लोग दूर-दूर से यहां ज्ञान लेने आते थे।

एक बार इसी आश्रम के दो साधु एक नदी के किनारे खड़े थे। नदी में पानी गहरा था। दोनों आपस में अपने ज्ञान का आदान-प्रदान कर रहे थे। तभी दोनों की नजर नदी के दूसरे किनारे पर पड़ी। सामने वाले किनारे पर एक युवती खड़ी थी। वो परेशान थी क्योंकि उसे नदी पार करनी थी और उस समय वहां कोई नाव नहीं थी। युवती ने साधुओं को आवाज लगाई। उसने दोनों से कहा कि मुझे नदी पार करके घर जाना है, कृपया मेरी सहायता कर दीजिए। एक ब्रह्मचारी ने जवाब दिया कि देवी, हम ब्रह्मचारी हैं, नारी को स्पर्श नहीं कर सकते। हमें क्षमा कर दो।

युवती की घबराहट बढ़ रही थी। दूसरा ब्रह्मचारी ये सब देख रहा था। उसे युवती की परेशानी समझ आ रही थी। उसने कुछ विचार किया और नदी में कूद गया। तैर कर दूसरे किनारे पर पहुंचा और युवती को अपनी पीठ पर उठाकर नदी पार करा दी। पहला ब्रह्मचारी ये सब देख रहा था। युवती अपने घर के लिए निकल गई। दोनों ब्रह्मचारियों ने भी आश्रम का रास्ता पकड़ा। पहले ब्रह्मचारी ने युवती की मदद करने वाले अपने साथी से कहा, मित्र ये तुमने क्या कर दिया। नारियों को छूना भी हमारे पाप है और तुमने तो उसे अपनी पीठ पर लाद कर नदी पार करा दी। दूसरा ब्रह्मचारी चुप रहा। कोई जवाब नहीं दिया।

पूरे रास्ते पहला ब्रह्मचारी इसी विषय पर बोलता रहा। दूसरे को उसकी गलती बताता रहा। जब दोनों आश्रम के द्वार पर पहुंचे, तब भी पहला वाला यही बात दोहरा रहा था, कि मित्र तुमने आज नियम तोड़ दिया है, ठीक नहीं किया, तुम्हें प्रायश्चित करना होगा। तभी दूसरे ने मुस्कुराते हुए कहा मित्र मैंने तो उस युवती को नदी के किनारे पर ही उतार दिया था, लेकिन तुम तो उसे अभी तक उठाए-उठाए फिर रहे हो। मैं तो उसको भूल भी गया, तुमने उसे दिमाग में उठा रखा है। पाप कहां हुआ?

मैंने तो उसकी सहायता की। उसे पीठ पर बैठाया लेकिन उसके लिए मन में कोई दूषित भाव नहीं था। सहायता का ही भाव था। उसे छोटी बहन मानकर नदी पार करा दी। मन कहीं भटका नहीं। लेकिन तुमने तो अपने मन में पाप वाली भावनाएं बैठा लीं। किसी के लिए ऐसा सोचना पाप है। मन को शुद्ध रखो, ब्रह्मचर्य मन की अवस्था है, अगर मन में पाप के भाव हैं तो कभी ब्रह्मचर्य सफल नहीं हो सकता। पहले ब्रह्मचारी को अपनी गलती का एहसास हो गया। उसने अपने मित्र से क्षमा मांगी। और जीवन का इतना महत्वपूर्ण पाठ पढाने के लिए धन्यवाद भी दिया।

कहानी का सार

पाप और पुण्य कर्मों से नहीं होते। उसके पीछे के उद्देश्य से पाप और पुण्य का फैसला होता है। अगर किसी गलत भावना से हम किसी की मदद भी करते हैं तो वो पाप है, लेकिन किसी अच्छे उद्देश्य के लिए हम कोई नियम भी तोड़ते हैं तो वो पाप नहीं है। जैसे, सैनिक अपने देश की रक्षा के लिए दुश्मन को मारता है और कोई डाकू धन के लिए किसी को मारता है। दोनों के कर्म एक हैं लेकिन उद्देश्य अलग-अलग, इसलिए हम सैनिक का सम्मान करते हैं, डाकू को सजा मिलती है।

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