फुटबॉल WC में इस्तेमाल होगी पाकिस्तान की बॉल, 3 हजार साल पहले दुश्मनों के कटे सिर से खेला जाता था खेल

टेलस्टार-18 में चिप लगी है। जिसके जरिए बॉल को स्मार्ट फोन से कनेक्ट कर खेल से जुड़े कई अहम स्टैट हासिल किए जा सकते हैं।

dainikbhaskar.com| Last Modified - Jun 05, 2018, 06:20 PM IST

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History of Football World Cup first played in China

स्पोर्ट्स डेस्क. 21वें फुटबॉल वर्ल्ड कप का इंतजार खत्म होने को है। इस खेल को 'मदर ऑफ ऑल बॉल' भी कहा जाता है। 14 जून से 32 देशों की टीमें खिताब के लिए आपस में भिड़ेंगी। रूस में होने वाले इस टूर्नामेंट में पहली बार वीडियो असिस्टेंट रेफरी (VAR) का इस्तेमाल होगा। सभी मैच चिप लगी 'टेलस्टार-18' बॉल से खेले जाएंगे। 32 दिन चलने वाले टूर्नामेंट का फाइनल 15 जुलाई को होगा। मेजबान रूस ने इस टूर्नामेंट के आयोजन पर 12 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। बता दें कि इतिहास में फुटबॉल का इतिहास करीब 3 हजार पुराना माना जाता है। तब फुटबॉल जैसा एक खेल खेला जाता था, जिसमें बॉल के तौर पर दुश्मनों का कटा सिर इस्तेमाल होता था। पहली बार चिप लगी बॉल से हो रहा वर्ल्ड कप....

- रूस में होने वाले फीफा वर्ल्ड कप में जिस बॉल का इस्तेमाल होगा, उसका नाम टेलस्टार-18 है। इसे फीफा की पार्टनर कंपनी और 1970 से वर्ल्ड कप में बॉल सप्लाई कर रही एडिडास ने डिजाइन किया है।
- ये लगातार 13वां फीफा वर्ल्ड कप है, जिसकी बॉल एडिडास कंपनी ने डिजाइन की है। इसका नाम एडिडास द्वारा 1970 में डिजाइन की गई पहली बॉल टेलस्टार के नाम पर टेलस्टार-18 रखा है।
- 1970 के दशक में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी चलन में थे। खेल के दौरान टीवी दर्शकों को बॉल आसानी से दिखे, इसलिए इसमें पहली बार सफेद के साथ काले पैनल का इस्तेमाल किया गया था। 
- टेलस्टार-18 में NFC चिप लगी है। इस चिप के जरिए बॉल को स्मार्ट फोन से कनेक्ट कर खेल से जुड़े कई अहम स्टैट हासिल किए जा सकते हैं। इस बॉल को आम लोग और प्लेयर्स भी मार्केट से खरीद सकते हैं।

 

पाकिस्तान में बनी है बॉल

 

- भले ही इस वर्ल्ड कप में पाकिस्तान की फुटबॉल टीम नहीं है। लेकिन उसके लिए खुशी की बात ये है कि दुनिया के इस सबसे बड़े खेल इवेंट में से एक में वहीं बनी बॉल का इस्तेमाल होगा।

- टेलस्टार-18 का प्रोडक्शन पाकिस्तान के सियालकोट स्थित कंपनी फॉरवर्ड स्पोर्ट्स ने किया है। यह कंपनी बॉल बनाने के लिए दुनियाभर में मशहूर है।
- कंपनी हर महीने 7 लाख बॉल बनाती है। 1994 से यह एडीडास के साथ काम कर रही है। 2014 और 2018 वर्ल्ड कप के लिए भी इसी कंपनी ने बॉल बनाई थी।

 

दुनिया की सबसे पुरानी बॉल साढ़े 4 सौ साल पुरानी 

 

- दुनिया की सबसे पुरानी फुटबॉल बॉल और ट्रॉफी स्कॉटलैंड के ग्लासगो म्यूजियम में रखी है। ये बॉल इंग्लैंड स्टर्लिंग कैसल के क्वीन चैंबर में मिली थी। माना जाता है कि यह 1540 के दशक में बनी थी। इसे बनाने में चमड़े का इस्तेमाल हुआ था।
- स्कॉटलैंड में फुटबॉल 1497 से खेला जाता रहा है। उस दौर में गोल्फ के साथ-साथ फुटबॉल भी शाही खेल होता था। राजा-रानी का पूरा परिवार इसमें शामिल होते थे। 
1930 में फाइनल का पहला हाफ एक टीम तो दूसरा हाफ दूसरी टीम की बॉल से खेला गया... 
- 1930 ऑफिशियल बॉल नहीं थी। फाइनल में पहला हाफ अर्जेंटीना की गेंद टिएंटो से और दूसरा हाफ उरुग्वे की गेंद टी-मॉडल से हुआ। 1934 की गेंद का नाम फेडरडेल था।

 

फुटबॉल है चीन की देन, सिर से भी खेला जा चुका

 

- फुटबॉल की सबसे पुरानी बॉल करीब साढ़े चार सौ साल पहले की उपलब्ध है, लेकिन फुटबॉल का इतिहास करीब तीन हजार साल पुराना है। पहले युद्ध जीतने पर विरोधियों के कटे हुए सिर को किक करने जैसा खेल प्रचलन में था। 
- ऐतिहासिक संदर्भों से जो तथ्य मिलते हैं, उसके मुताबिक बॉल के तौर पर मानव या जानवरों की खोपड़ी, जानवरों के ब्लाडर, कपड़ों को सिल कर बनाए गट्‌ठर का इस्तेमाल होता रहा है।
- चीन के हान साम्राज्य (करीब 2250 साल पहले) में जानवरों के चमड़े से बनी बॉल से फुटबॉल जैसा खेल प्रचलन में था। फुटबॉल की वैश्विक संस्था फीफा इसे फुटबॉल के सबसे पुराने नियमबद्ध फॉर्मेट के तौर पर मान्यता देती है। वहां से ये दुनियाभर में फैला।
- मध्यकाल में जानवरों (विशेषकर सूअर) के ब्लाडर को चमड़े से कवर किया जाने लगा ताकि बॉल को बेहतर शेप मिल सके। 19वीं शताब्दी में रबड़ के ब्लाडर बनने तक फुटबॉल की बॉल बनाने की यही प्रक्रिया जारी रही।

 

पहली रबर बॉल 1836 में गुडईयर कंपनी ने बनाई थी

 

1836: ब्रिटेन के चार्ल्स गुडईयर ने पहली बार जानवर के ब्लॉडर की जगह रबर की गेंद बनाई। उन्होंने इसका पेटेंट भी कराया था। 
1862: एचजे लिंडन ने रबर के फुलाए जाने वाले ब्लाडर बनाए। उनकी पत्नी फुटबॉल के लिए जानवरों के ब्लाडर फूंक कर फुलाती थीं। उन्हें फेफड़े की बीमारी हो गई। तब लिंडन ने रबर के फुलाए जा सकने वाले ब्लाडर बनाए। 
1863: उस समय नए-नए अस्तित्व में आए इंग्लिश फुटबॉल एसोसिएशन ने फुटबॉल के नियम बनाए। हालांकि, उन नियमों में गेंद के आकार के बारे में कुछ नहीं कहा गया था। 
1872: नियम संशोधित किए गए। तय किया गया कि गेंद निश्चित रूप से गोल होगी (स्फेरिकल)। इसका सरकमफेरेंस 27 से 28 इंच (68.6 सेंटीमीटर से 71.1 सेंटीमीटर) होगा। यही नियम आज भी जारी है।

 

ऐसा रहा अब तक की बॉल का सफर

 

- 1930 में फाइनल का पहला हाफ एक टीम से तो दूसरा हाफ दूसरी टीम की बॉल से खेला गया

- 1938 में एलन बॉल आई। पहली बार किसी कंपनी ने वर्ल्ड कप में बॉल की ब्रांडिंग की। दूसरे विश्व युद्ध के कारण 1942 और 1946 में वर्ल्ड कप का आयोजन नहीं हुआ। 
- 1970 में टेलस्टार आई। ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर गेंद बेहतर तरीके से दिखे, इसलिए ब्लैक एंड व्हाइट बॉल बनाई। 1974 में डरलास्ट, 1978, 1982 में टैंगो बॉल आई। 
- 1986 एजटेका आई। पहली आर सिंथेटिक बॉल से मैच हुए। 1990 में यूनिको, 1994 में क्वेस्त्रा, 1998 में ट्राई कलर, 2002 में फेवरनोवा, 2006 में टीम जीस्ट का इस्तेमाल।
- 2010 में जबुलानी आई। इसमें 8 पैनल थे। इससे शॉट की ट्रैजेक्टरी का अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया। जिसके बाद गोलकीपर इसका बहिष्कार करने लगे, तो 2014 में ब्रजूका बॉल लाई गई।

History of Football World Cup first played in China
रूस में 14 जून से होने वाले फीफा वर्ल्ड कप में जिस बॉल का इस्तेमाल होगा, उसका नाम टेलस्टार-18 है।
History of Football World Cup first played in China
ये तस्वीर दुनिया की सबसे पुरानी फुटबॉल बॉल और ट्रॉफी की है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो म्यूजियम में रखी है।
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ये बॉल इंग्लैंड स्टर्लिंग कैसल के क्वीन चैंबर में मिली थी।
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ब्रिटेन के चार्ल्स गुडईयर ने साल 1836 में पहली बार जानवर के ब्लॉडर की जगह रबर की बॉल बनाई। उन्होंने इसका पेटेंट भी कराया था।
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