फीफा विश्वकप: 44 साल बाद टेलस्टर बॉल की वापसी, 600 खिलाड़ियों ने लिया ट्रायल; पाकिस्तान में बनी है गेंद

फ्रांस में 1998 में हुए विश्वकप में पहली बार 3 रंग की बॉल से मैच खेला गया था।

DainikBhaskar.com| Last Modified - Jun 04, 2018, 04:55 PM IST

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Telstar 18 the official ball for 2018 World Cup russia

  • फुटबॉल के इस महाकुंभ में 44 साल बाद टेलस्टर बॉल की वापसी
  • एडिडास ने लगातार 13वीं बार वर्ल्ड कप की गेंद डिजाइन की है

 

नई दिल्ली.  रूस में 14 जून से 21वें फुटबॉल विश्वकप की शुरुआत होगी। 32 देशों के खिलाड़ी 12 स्टेडियम में विश्वकप को जीतने के लिए मैदान पर उतरेंगे। हर बार विश्वकप से पहले मैचों के दौरान इस्तेमाल में लाई जाने वाली बॉल की चर्चाएं तेज हो जाती हैं। विश्वकप बॉल के डिजाइन में समय के साथ-साथ बहुत बदलाव हुआ। 2010 में दक्षिण अफ्रीका में जाबुलानी तो 2014 में ब्राजील में ब्राज़ूका गेंद फुटबॉल विशेषज्ञों के बीच चर्चा में रही। वहीं, इस बार 1970 और 1974 विश्वकप में इस्तेमाल किए गए टेलस्टर बॉल की वापसी हुई है। इसमें 32 की जगह 6 पैनल होंगे। खास यह है कि इसमें चिप लगाई गई है। इसके जरिए गेंद को स्मार्ट फोन से कनेक्ट कर खेल से जुड़े कई अहम आंकड़े हासिल किए जा सकते हैं। यह गेंद आम लोगों और खिलाड़ियों के खरीदने के लिए भी उपलब्ध है। इसे पाकिस्तान में बनाया गया है।

 

 

 

टेलस्टर-18 में खास क्या है?
- टेलस्टर-18 का उपयोग रूस में वर्ल्ड कप मैचों के दौरान किया जाएगा। 1970 टेलस्टर बॉल की तरह ही इसको डिजाइन किया गया है। गेंद में केवल छह पैनल वॉल हैं जबकि पुराने टेलस्टर में 32 पैनल वॉल एक साथ थे। इस बार इसकी सतह को भी 3डी डिजाइन में बनाया गया है।
- टेलस्टर-18 में एनएफसी माइक्रोचिप लगा हुआ है। इससे एडिडास कंपनी के उपभोक्ता मोबाइल को सीधे गेंद से जोड़ सकते हैं, जो कि उन्हें पैर से लगे शॉट और हेडर सहित अन्य जानाकरियां देगा। 1994 में अमेरिका हुए विश्वकप के बाद पहली बार गेंद सिर्फ काले और सफेद रंग में होगा।

 

टेलस्टर-18 से खेल पर क्या असर होगा?
- गेंद में छह पैनल वॉल होने से उसकी फ्लाइट स्टैबलिटी बढ़ जाएगी। माना ये भी जा रहा है कि 3डी सतह होने के कारण गेंद को कंट्रोल करना आसान होगा। काले और सफेद रंग के कारण बॉल टीवी पर साफ-साफ दिखेगा और दर्शकों की आंखों को राहत देगा। टेलस्टर-18 किक लगने के बाद हवा में काफी देर तक लहराएगी, जिससे इसके गति को परखना आसान नहीं होगा।
-स्विटरजरलैंड के वैज्ञानिकों ने कई प्रयोगों के बाद इस गेंद को खेलने के लिए योग्य माना। इसके आकार को जांचने के लिए प्रयोगशाला में 2,000 से ज्यादा बार बॉल को स्टील की दीवार पर 50 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से मारा गया लेकिन इसका आकार नहीं बदला।


पाकिस्तान के सियालकोट में बनी टेलस्टर-18
- टेलस्टर-18 गेंद पाकिस्तान के सियालकोट शहर में बनी। 12 देशों के 600 से ज्यादा खिलाड़ियों ने इसका टेस्ट किया। जिसमें जिनेडिन जिडान, रोनाल्डो, लियोनल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो समेत अन्य खिलाड़ी भी शामिल हैं।
- बॉल का इस्तेमाल 2017 फीफा क्लब विश्वकप में अल-जजीरा और रियाल मैड्रिड के बीच हुए सेमीफाइनल मैच में किया गया था। फीफा ने अंडर -20 विश्वकप समेत कई जूनियर टूर्नामेंट में इसका टेस्ट किया।

 

1998 में पहली बार तीन रंग के बॉल से हुआ था मैच
- फ्रांस में 1998 में हुए विश्वकप के दौरान पहली बार तीन रंग की बॉल से मैच खेला गया था। फीफा ने उस समय ट्राइकलर नाम की नए बॉल को जारी किया था। ये फ्रांस के झंडे से प्रेरित था, जिसमें 3 रंग हैं। साथ ही पहली बार गेंद यूरोप से बाहर मोरक्को और इंडोनेशिया में बनाई गई थी।
-2002 में दक्षिण कोरिया और जापान की संयुक्त मेजबानी में हुए विश्वकप में फेवरनोवा नाम के बॉल का इस्तेमाल किया था। हवा में फ्लाइट के दौरान गेंद की सटीकता बढ़ाने के लिए निर्माताओं ने गेंद की भीतरी परत को मोटा कर दिया था। लेकिन, कम वजन के कारण बॉल की काफी आलोचना की हुई थी।

 

पहली बार हर मैच के लिए अलग-अलग गेंद का इस्तेमाल हुआ
- दक्षिण कोरिया और जापान के बाद 2006 में जर्मनी ने विश्वकप का आयोजन किया। इसमें हर मैच के लिए अलग-अलग टीमगाइस्ट नाम के बॉल का इस्तेमाल किया था। जिस पर मैच की तारिख, टीम और स्टेडियम के नाम अंकित होते थे। फाइनल मैच में रंगीन गेंद का प्रयोग हुआ। ब्राजील और इंग्लैंड के खिलाड़ियों ने आरोप लगाया था कि बॉल हल्का होने के कारण गिला होने पर ठीक से मूव नहीं करता है।
- साउथ अफ्रीका में 2010 विश्वकप में इंग्लैंड के लॉफबॉरो यूनिवर्सिटी में तैयार जाबुलानी गेंद का इस्तेमाल किया गया था। साधारण गेंद में 32 पैनल होते हैं। लेकिन, जाबुलानी में 8 पैनल थे। असमान तेजी और अस्थिरता के कारण कई खिलाड़ियों और टीम के कोच ने इसकी आलोचना की।

 

ब्राजील में बॉल का नाम रखने के लिए वोटिंग हुआ था
- ब्राजील में हुए वर्ल्डकप 2014 में ब्राज़ूका का बॉल का इस्तेमाल किया था। स्थानीय भाषा में ब्राज़ूका का मतलब ब्राजीली होता है। बॉल का नाम रखने के लिए 10 लाख ब्राजीली प्रशंसकों ने वोट किया था। जिसमें  से 70 फिसदी वोट ब्राज़ूका नाम के लिए आए थे। बोसानोवा और कार्नावालेस्का नाम को लोगों ने नकार दिया। ढाई साल तक जांच के बाद ब्राज़ूका को वर्ल्डकप के लिए फाइनल किया था। 

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