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14 साल की उम्र में रोजाना 4 घंटे शूटिंग की प्रैक्टिस और 1 घंटा योग

4 वर्ष पहले
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  • एशियन एयरगन चैम्पियनशिप ताइपेई में 10 मीटर एयर पिस्टल इवेंट में गोल्ड और सिल्वर जीता
  • ईशा ने कहा- नेशनल लेवल पर 6 हजार शूटर्स, उनके बीच अपनी जगह बना पाना आसान नहीं होता

खेल डेस्क. 14 साल की ईशा सिंह के घर में उनका कवर्ड और उनके कमरे की दीवार अच्छी खासी तादाद में मैडल्स से भर गई है। लेकिन ये मैडल्स मेहमानों या ईशा के नए-नए बने प्रशंसकों को दिखाने के लिए नहीं लगाए गए हैं। ये अवॉर्ड्स तो ईशा को याद दिलाते रहते हैं कि यह महज एक शुरुआत है और मंजिल अभी बहुत दूर है। ईशा मीडिया में पहली बार सुर्खियों में तब छाईं थी, जब उन्होंने नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप (2018) में महिला, यूथ और जूनियर तीनों वर्गों में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया था। ईशा ने मनु भाकर और हिना सिद्धू जैसे नामी शूटर्स तक के रिकॉर्ड तोड़ दिए थे।

1) खेलो इंडिया इवेंट ने मुझे काफी कुछ सिखाया

ईशा को जानने वाले आश्चर्य करते हैं कि इतनी कम उम्र में खेल और जिंदगी को लेकर इतनी मैच्योरिटी उनमें कैसे आ गई। 2017 में 'खेलो इंडिया गेम्स' के दौरान उनकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब थी। उनके गेम यानी एयर पिस्टल इवेंट से एक रात पहले वह खड़ी भी नहीं हो पा रही थीं। इस इवेंट में वह तीसरे नंबर पर रहीं थी। इंटरव्यूज़ में ईशा ने बताया कि खेलो इंडिया के इस इवेंट ने मुझे अहसास कराया कि इस खेल के लिए मैं अपने आपको कितना पुश कर सकती हूं।

3) खेलो इंडिया इवेंट ने मुझे काफी कुछ सिखाया

ईशा को जानने वाले आश्चर्य करते हैं कि इतनी कम उम्र में खेल और जिंदगी को लेकर इतनी मैच्योरिटी उनमें कैसे आ गई। 2017 में 'खेलो इंडिया गेम्स' के दौरान उनकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब थी। उनके गेम यानी एयर पिस्टल इवेंट से एक रात पहले वह खड़ी भी नहीं हो पा रही थीं। इस इवेंट में वह तीसरे नंबर पर रहीं थी। इंटरव्यूज़ में ईशा ने बताया कि खेलो इंडिया के इस इवेंट ने मुझे अहसास कराया कि इस खेल के लिए मैं अपने आपको कितना पुश कर सकती हूं।

ईशा कहती हैं कि नेशनल लेवल पर छह हजार शूटर्स हैं, उनके बीच अपनी जगह बना पाना आसान नहीं होता। दूर से भले ही शूटिंग का खेल आसान लगता हो, लेकिन प्रोफेशनल लेवल पर उतना ही कठिन है। ईशा अपने गेम को बखूबी जानती हैं इसलिए कहती हैं, 'शूटिंग में मेंटल टफनेस काम आती है। प्रेशर को हैंडल करना आना चाहिए। गेम के दौरान अगर आप मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाएंगे, तो हाथ कांपने लग जाएंगे।

ईशा कहती हैं कि नेशनल लेवल पर छह हजार शूटर्स हैं, उनके बीच अपनी जगह बना पाना आसान नहीं होता। दूर से भले ही शूटिंग का खेल आसान लगता हो, लेकिन प्रोफेशनल लेवल पर उतना ही कठिन है। ईशा अपने गेम को बखूबी जानती हैं इसलिए कहती हैं, 'शूटिंग में मेंटल टफनेस काम आती है। प्रेशर को हैंडल करना आना चाहिए। गेम के दौरान अगर आप मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाएंगे, तो हाथ कांपने लग जाएंगे।

इस टफनेस को बनाए रखने के लिए मैं रोज चार घंटे शूटिंग की प्रैक्टिस करने के अलावा एक घंटे नियमित रूप से योगाभ्यास करती हूं। योग से मन को शांत रखने की ताकत मिलती है।' ईशा खाली समय में पेंटिंग और फोटोग्राफी करती हैं।

इस टफनेस को बनाए रखने के लिए मैं रोज चार घंटे शूटिंग की प्रैक्टिस करने के अलावा एक घंटे नियमित रूप से योगाभ्यास करती हूं। योग से मन को शांत रखने की ताकत मिलती है।' ईशा खाली समय में पेंटिंग और फोटोग्राफी करती हैं।

ईशा के पिता सचिन सिंह कहते हैं कि वह किसी चीज से परेशान और डिस्ट्रेक्ट नहीं होती। उसके दिमाग में एक ही चीज पूरे समय घूमती रहती है, वह है देश के लिए खेलना और अपने रोज के प्रदर्शन को बेहतर करना। सचिन सिंह नेशनल रैली ड्राइवर रहे हैं। फिलहाल तेलंगाना में स्पोर्ट्स शॉप चलाते हैं। सचिन चाहते थे कि ईशा प्रोफेशनल लेवल पर कोई खेल खेले। बचपन में वह टेनिस और बैडमिंटन खेलती थी। 2014 में वे ईशा को अपने एक दोस्त गौतम से मिलाने सिकंदराबाद में ही गचीबोली शूटिंग रेंज ले गए।

ईशा के पिता सचिन सिंह कहते हैं कि वह किसी चीज से परेशान और डिस्ट्रेक्ट नहीं होती। उसके दिमाग में एक ही चीज पूरे समय घूमती रहती है, वह है देश के लिए खेलना और अपने रोज के प्रदर्शन को बेहतर करना। सचिन सिंह नेशनल रैली ड्राइवर रहे हैं। फिलहाल तेलंगाना में स्पोर्ट्स शॉप चलाते हैं। सचिन चाहते थे कि ईशा प्रोफेशनल लेवल पर कोई खेल खेले। बचपन में वह टेनिस और बैडमिंटन खेलती थी। 2014 में वे ईशा को अपने एक दोस्त गौतम से मिलाने सिकंदराबाद में ही गचीबोली शूटिंग रेंज ले गए।

गौतम गियानथंडानी ट्रैप शूटिंग में नेशनल मैडलिस्ट थे और स्कीट गन से शूटिंग कर रहे थे। उस वक्त 8 साल की ईशा ने शूटिंग रेंज देखकर ही पिता से कह दिया कि उन्हें शूटिंग करनी है। स्कीट गन उठाना उनके लिए मुश्किल था, तो गौतम ने हल्की गन, एयर पिस्टल से शूिटंग करने की सलाह दी। पिता सचिन ने अपने घर में भी शूटिंग रेंज बनाई है।

गौतम गियानथंडानी ट्रैप शूटिंग में नेशनल मैडलिस्ट थे और स्कीट गन से शूटिंग कर रहे थे। उस वक्त 8 साल की ईशा ने शूटिंग रेंज देखकर ही पिता से कह दिया कि उन्हें शूटिंग करनी है। स्कीट गन उठाना उनके लिए मुश्किल था, तो गौतम ने हल्की गन, एयर पिस्टल से शूिटंग करने की सलाह दी। पिता सचिन ने अपने घर में भी शूटिंग रेंज बनाई है।

महज एक साल की प्रैक्टिस में ही ईशा स्टेट चैम्पियन बन गईं। उसके बाद ईशा ने खारखाना (तेलंगाना) स्थित ओलिंपियन गगन नारंग की शूटिंग रेंज में कुछ समय प्रैक्टिस की और इसके बाद गगन नारंग की ही शूटिंग अकेडमी गन फॉर ग्लोरी, पुणे में एक साल प्रोजेक्ट लीप कैंप के तहत शूटिंग की प्रैक्टिस की।

महज एक साल की प्रैक्टिस में ही ईशा स्टेट चैम्पियन बन गईं। उसके बाद ईशा ने खारखाना (तेलंगाना) स्थित ओलिंपियन गगन नारंग की शूटिंग रेंज में कुछ समय प्रैक्टिस की और इसके बाद गगन नारंग की ही शूटिंग अकेडमी गन फॉर ग्लोरी, पुणे में एक साल प्रोजेक्ट लीप कैंप के तहत शूटिंग की प्रैक्टिस की।

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