जज्बा / तीन साल पहले पिता और कोच की मौत के बावजूद गोमती ने गोल्ड जीता



गोमती मरिमुथु। गोमती मरिमुथु।
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गोमती मरिमुथु।गोमती मरिमुथु।

  • जिन फ्रांसिस मैरी से गोमती को करिअर की सबसे बड़ी हार मिली, वही बाद में उनकी मेंटर बनीं
  • गोमती मरिमुथु ने एशियन एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में 800 मीटर रेस में गोल्ड जीता

Dainik Bhaskar

May 06, 2019, 09:19 AM IST

चेन्नई. दोहा में हुई एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत की गोमती मरिमुथु ने हाल ही में 800 मीटर रेस में गोल्ड जीता। गोमती तमिलनाडु की रहने वाली हैं। वे कहती हैं- 'जब से दोहा से वापस आई हूं, लोग मुझे पहचान रहे हैं। किसी न किसी तरह से मेरी मदद करना चाहते हैं, लेकिन ये पहले ऐसा नहीं था।' दरअसल गोमती ने यूं भी देर से ही करिअर शुरू किया। 20 की उम्र में उन्होंने प्रोफेशनल रनिंग शुरू की। 3 साल पहले जब गोमती का करिअर कुछ बनता दिख रहा था तो पिता मरिमुथु और कोच गांधी का निधन हो गया। गोमती को ट्रेनिंग देने के लिए भी कोई नहीं बचा। उन्हें ग्रोइन इंजरी भी हो गई, जिससे 2 साल रनिंग से दूर रहना पड़ा। गोमती इस संघर्ष पर कहती हैं- 'मेरे पिता मेरी ट्रेनिंग के पैसे बचाने के लिए कई बार भूखे रहते थे। कठिनाइयां तो थीं, पर जिद थी कि मेडल लाना है।'

शाइनी विलसन गोमती की प्रेरणा हैं

  1. गोमती ने कहा, 'रनिंग में करिअर बनाने या प्रोफेशनल लेवल पर रनिंग करने का कोई इरादा नहीं था। मैं तो बस यूं ही खेल-खेल में दौड़ा करती थी। 20 साल की उम्र में मेरे कोच ने सलाह दी कि मुझे अपने इस हुनर को और तराशना चाहिए। तब जाकर मैंने तौर-तरीकों के साथ रनिंग की ट्रेनिंग लेनी शुरू की। कोच के साथ-साथ मेरे पिता ने भी खूब सपोर्ट किया। मेरी डाइट और ट्रेनिंग के लिए पैसे बचे रहें, इसलिए पिता कई वक्त भूखे ही रह जाते थे। तब पिता को देखकर मुझे तो रोना आ जाता था।'

  2. 'गांव वाले भी कहते थे कि खेल छोड़ो और स्पोर्ट्स कोटे से नौकरी लेकर परिवार की मदद करो। इसी बीच मुझे बेंगलुरू के आयकर विभाग में नौकरी मिल भी गई, पर पिता ने ही खेल छोड़ने से रोक दिया। उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई थी तो मैंने सोचा कि अब खेल छोड़कर नौकरी पर ही ध्यान देना चाहिए। तब पिता ने कहा कि रनिंग ही तुम्हारा जुनून है और इसकी खातिर तुमने काफी समर्पण किया है। इसलिए अब इसे छोड़ना नहीं है। इसके बाद मेरी एक ही जिद रह गई- रनिंग में गोल्ड जीतना।'

  3. 'दुर्भाग्य से इस एक साल में ही मेरे पिता और फिर मेरे कोच का भी निधन हो गया। मेरे पास कोई ऐसा इंसान तक नहीं बचा, जो मुझे ट्रेनिंग दे सके। मुझे भी ग्रोइन इंजरी की वजह से 2 साल तक रनिंग से दूर रहना पड़ा। ये मेरा सबसे मुश्किल दौर था। शायद वो दौर ना होता, तो मेरा ये गोल्ड मेडल और पहले आ गया होता। ऐसे दौर में फ्रांसिस मैरी ने मेरी मदद की। फ्रांसिस अक्का (गोमती, फ्रांसिस को अक्का यानी बड़ी बहन कहकर बुलाती हैं) से मेरा सामना 2011 में हुआ था। वे उम्र में मुझसे बड़ी थीं और एक बच्चे की मां भी थीं। अक्का ने एक साल के भीतर 2 इवेंट में मुझे हराया। ये मेरी करिअर की सबसे मुश्किल हार थी।'

  4. 'रेस देखने आए लोग मेरी हूटिंग कर रहे थे कि मैं उम्र में बड़ी महिला से हार गई। मैं युवा थी। ऐसी हूटिंग मेरे लिए असहनीय थी। ऐसे में अक्का ही मेरा सहारा बनीं। उन्होंने न सिर्फ मुझे ट्रेनिंग दी, बल्कि मानसिक मजबूती हासिल करने में भी मदद की। मैं दोहा से गोल्ड जीतकर आई तो सबसे पहले अक्का से ही मिलने गई। जिस वक्त मैं टूटकर खेल छोड़ने का मन बना चुकी थी, उस वक्त अक्का ने ही मुझे समझाया कि मैं रनिंग के लिए ही बनी हूं। वे मेरा परिवार हैं।'

  5. 'पहले लोग मुझे जानते ही नहीं थे। मदद नहीं मिलती थी। अब मुझे पहचान रहे हैं। मेरे स्कूल में भी मेरा सम्मान किया गया। गांव वाले भी खूब प्यार दे रहे हैं। लेकिन ये मंजिल नहीं है। मेरा अगला लक्ष्य वर्ल्ड चैंपियनशिप है। फिर ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई करना है। टोक्यो में 2020 में देश का प्रतिनिधित्व करना है और मेडल जीतना है।'

  6. 1985 से लगातार 14 साल तक 800 मीटर स्प्रिंट में भारत की नेशनल चैंपियन रहीं पद्मश्री विजेता रनर शाइनी विलसन गोमती की प्रेरणा हैं। गोमती बताती हैं- 'मैं जब भी उत्साह में कमी महसूस करती थी तो शाइनी मैडम को याद करती थी। वे मेरी प्रेरणा हैं। उन्होंने भी तमाम मुश्किलें पार कीं और ओलिंपिक की 800 मीटर रेस के सेमीफाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। 2017 में मैं शाइनी मैडम से मिली। उनसे मुलाकात ने मुझे मुश्किल दौर से उबरने में काफी मदद की।'

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