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भारतीय क्रिकेट को बदल देने वाली जीत:सबसे बड़े टारगेट का पीछा करने का बनाया था वर्ल्ड रिकॉर्ड, युवी और कैफ बने थे स्टार

नई दिल्ली5 महीने पहले

उधर सचिन तेंदुलकर आउट और इधर टीवी बंद। 90 के दशक में भारतीय घरों में यह नजारा आम था। तब टीम इंडिया की जीत अक्सर एक खिलाड़ी के ऊपर निर्भर होती थी। सचिन तेंदुलकर के ऊपर। लेकिन, 13 जुलाई 2002 को सब बदल गया।

उस दिन भी सचिन के आउट होने के बाद हमारे घरों में टीवी बंद हुए थे। लेकिन, कुछ ही देर बाद पता चला कि हम हारे नहीं जीत गए। वह नेटवेस्ट ट्रॉफी का फाइनल था। यह एक ऐसी जीत साबित हुई जिसने टीम इंडिया को बदल कर रख दिया। यह ऐसी जीत थी जिसने एक कप्तान को दादा का खिताब दिया और इससे युवराज सिंह और मोहम्मद कैफ के रूप में दो मैच विनर भी हमें मिले।

भारत ने चेज किया था 326 रन का टारगेट
नेटवेस्ट ट्रॉफी एक त्रिकोणीय क्रिकेट टूर्नामेंट था। मेजबान इंग्लैंड के अलावा भारत और श्रीलंका ने इसमें हिस्सा लिया था। फाइनल में भारत और इंग्लैंड की टीमें पहुंची थी। इंग्लैंड ने खिताबी मुकाबले में पहले बल्लेबाजी करते हुए 5 विकेट पर 325 रन बना दिए। ओपनर मार्क ट्रेस्कोथिक और कप्तान नासिर हुसैन ने शतक जमाया। भारत को जीत के लिए 326 रन का टारगेट मिला। इसे हासिल करने का मतलब था कि उस समय सबसे बड़े टारगेट का सफल पीछा करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना।

146 रन पर गिर गए थे भारत के पांच विकेट
विशाल टारगेट के जवाब में भारत की शुरुआत अच्छी रही थी। कप्तान सौरव गांगुली और वीरेंद्र सहवाग ने पहले विकेट की साझेदारी में 14.3 ओवर में 106 रन जोड़े। लेकिन अगले 40 रन में भारत के पांच विकेट गिर गए। सचिन तेंदुलकर 14 रन बनाकर पांचवें विकेट के रूप में आउट हुए।

युवराज और कैफ ने की 121 रन की पार्टनरशिप
सचिन के आउट होने के बाद भारतीय फैंस ने निराशा में टीवी सेट बंद कर लिए थे। लेकिन, उस दिन इतिहास बदलने वाला था। युवा बल्लेबाज युवराज सिंह (69 रन) और मोहम्मद कैफ (87 रन) ने छठे विकेट की साझेदारी में 121 रन जोड़कर भारत को मैच में वापस ला दिया। युवराज आउट हो गए लेकिन कैफ ने पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ मिलकर भारत को जीत दिला दी।

गांगुली की कप्तानी में पहली बड़ी जीत
नेटवेस्ट ट्रॉफी सौरव गांगुली की कप्तानी में भारत की वनडे क्रिकेट में पहली बड़ी जीत थी। साथ ही यह इंग्लैंड की धरती पर 1983 वर्ल्ड कप के बाद पहली बड़ी जीत थी। यहां से भारतीय टीम किसी एक खिलाड़ी पर निर्भर नहीं रही। यहां से भारतीय टीम सही मायने में टीम इंडिया बनी।

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