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महिला टी-20 वर्ल्ड कप / भाई के कहने पर गरीबी से लड़कर राधा के पिता ने कराई थी क्रिकेट की कोचिंग, छोटी सी झुग्गी में रहते थे

Radha Yadav: Radha Yadav Women Day Mahila Diwas 2020 Special | India Women Captain (IND W) Radha Yadav  Success Story and Life-History
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  • छोटी से झुग्गी में चार भाई-बहन और माता-पिता के साथ रहती थीं राधा यादव, अब अपनी स्पिन से दे रहीं दुनिया को चकमा
  • यूपी के जौनपुर के अजोशी गांव से मुंबई के कोलिवरी की बस्ती में 220 स्क्वायर फीट की झुग्गी में रहने लगा था परिवार

दैनिक भास्कर

Mar 07, 2020, 11:28 PM IST

मुंबई. महिला टी-20 वर्ल्ड कप का खिताब जीतने से भारत चूक गया। मैच में भारत की ओर से पहला विकेट लेने वाली स्पिनर राधा यादव के लिए भारतीय महिला क्रिकेट टीम में पहुंचने का सफर आसान नहीं था। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के अजोशी गांव से आकर उनका परिवार मुंबई के कोलिवरी बस्ती में 220 स्क्वायर फुट की झुग्गी में रहता था। भाई के साथ क्रिकेट खेलने गई राधा ने जब चौके-छक्के लगाए तो सब देखते रह गए। भाई ने पिता से राधा को क्रिकेट की कोचिंग कराने को कहा। दूध बेचकर परिवार चलाने वाले पिता ने अपनी गरीबी से लड़कर बेटी को क्रिकेट सिखाया।

पिता आज भी मुंबई में बेचते हैं दूध
19 साल की राधा की प्रारंभिक शिक्षा अजोशी गांव में ही हुई है। उन्होंने इंटर की परीक्षा केएन इंटर कॉलेज बांकी से उत्तीर्ण की। पिता प्रकाश चंद्र यादव मुंबई में आज भी दूध बेचते हैं, कुछ साल पहले राधा मुंबई आईं और यहां उन्होंने क्रिकेट की कोचिंग ली। उनकी परफॉरमेंस को देखते हुए 2018 में टीम इंडिया की चोटिल हुई प्लेयर राजेश्वरी गायकवाड़ की जगह दक्षिण अफ्रीका दौरा के लिए चुना गया था। वर्तमान में वह गुजरात से खेलती है।

6 साल की उम्र से खेल रही हैं क्रिकेट
राधा ने सिर्फ 6 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। पहले वह मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलती थी। गली में स्टंप लगाकर लड़कों के साथ एकमात्र लड़की को खेलते देख आसपास के लोग परिवार पर तंज कसते थे। पिता ओमप्रकाश बताते हैं- उन्हें अक्सर यह सुनने को मिलता था कि बेटी को इतनी छूट ठीक नहीं। लेकिन, उन्होंने बेटी को खुलकर अपनी मर्जी से खेलने की हमेशा छूट दी।

बैट खरीदने के पैसे नहीं थे, कोच ने नहीं ली फीस
चार भाई-बहनों में सबसे छोटी राधा के पिता छोटी सी दुकान चलाते हैं। छोटी सी दुकान से घर का खर्च, पढ़ाई-दवाई का खर्चा भी बमुश्किल निकल पाता है। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में राधा के पास किट तो दूर बैट खरीदने के पैसे नहीं थे। तब वह लकड़ी को बैट बनाकर अभ्यास करती थी। घर से तीन किमी दूर राजेंद्रनगर में स्टेडियम तक पिता साइकिल से उसे छोड़ने जाते और फिर दूसरी ओर से राधा टेम्पो तो कभी पैदल ही घर आती थीं। उनके घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी, इसलिए उनके कोच ने उसका खर्च उठाया और कोचिंग की फीस भी नहीं ली।

रिश्तेदारों से उधार लेकर दिलाई थी किट
राधा के भाई राहुल ने बताया- कोच फी कोचिंग देने तैयार थे, लेकिन क्रिकेट किट हमें खुद ही खरीदनी थी। घर पर पैसे नहीं थी, तो हमने आसपास के लोगों और रिश्तेदारों से पैसे उधार लिए और क्रिकेट की किट खरीदी। राहुल ने बताया, 'राधा का फोन फिलहाल बंद करवाया दिया गया है। इस कारण हमारी उनसे बात नहीं हो सकी है। लेकिन, हमने उनसे कहा है कि वे सही ढंग से क्रिकेट खेले। पूरे परिवार की उम्मीदें उनपर है।'

पहले मुंबई की टीम से खेलती थीं राधा
राधा यादव दो साल मुंबई क्रिकेट टीम और 3 साल वडोदरा क्रिकेट टीम की कप्तान रही हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उन्होंने कोच प्रफुल्ल नायक से प्रशिक्षण लिया है। 2015-16 के दौरान जब वे मुंबई से वडोदरा आए, वे भी मुंबई की टीम छोड़कर वडोदरा की टीम में चली गईं। वहां वड़ोदरा क्रिकेट एसोसिएशन के साथ जुड़ी।

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