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हाइट से जीता साउथ अफ्रीका:अफ्रीकी पेस बॉलिंग यूनिट की हाइट भारत से 17 सेंटीमीटर ज्यादा; मौसम, रोलर और कप्तानी ने भी पलटा पासा

केपटाउन5 महीने पहले

साउथ अफ्रीका ने जोहान्सबर्ग के वांडरर्स स्टेडियम में खेले गए दूसरे टेस्ट मैच में उलटफेर करते हुए टीम इंडिया को 7 विकेट से हराया। मेजबान टीम की इस जीत में कप्तान डीन एल्गर की जोरदार बैटिंग को काफी श्रेय दिया जा रहा है। एल्गर बेशक इस टेस्ट की कहानी के सबसे बड़े नायक रहे, लेकिन चार दिन तक चले एक्शन पैक्ड ड्रामे में कुछ अन्य अहम किरदारों ने भी गैरमामूली भूमिका अदा की। इसमें तेज गेंदबाजों की हाइट, हैवी रोलर, मौसम और कप्तानी भी शामिल हैं। चलिए इन सभी फैक्टर्स को एक-एक कर समझते हैं।

ज्यादा हाइट यानी ज्यादा बाउंस...नतीजा ज्यादा विकेट

वांडरर्स टेस्ट में साउथ अफ्रीका की पेस बॉलिंग यूनिट में कगिसो रबाडा, लुंगी एनगिडी, मार्को जेन्सन और डेन ओलिवियर शामिल थे। इनकी औसत हाइट 6 फीट 4 इंच है।

दूसरी ओर से भारत की ओर से जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शमी, मोहम्मद सिराज और शार्दूल ठाकुर खेले। इनकी औसत हाइट 5 फीट 9 इंच है।

यानी, साउथ अफ्रीकी पेस बॉलिंग यूनिट की हाइट भारतीय पेस बॉलिंग यूनिट से 7 इंच (17.78 सेंटीमीटर) ज्यादा है। इसका नतीजा यह हुआ कि उन्होंने हमारे गेंदबाजों की तुलना में औसतन 15-20 सेंटीमीटर ज्यादा उछाल हासिल की। वांडरर्स की पिच पर यह अंतर निर्णायक साबित हुआ।

फिर हम सेंचुरियन में कैसे जीत गए थे
सेंचुरियन में खेले गए पहले टेस्ट में भी बाउंस फैक्टर था, लेकिन वहां की पिच पर दोहरी उछाल थी। मतलब गेंद कभी सामान्य से ऊंची जा रही थी, तो कभी सामान्य से नीची। इस फैक्टर ने हाइट एंडवांटेज को काफी हद तक खत्म कर दिया।

वांडरर्स में ऐसा नहीं था। यहां बाउंस कंसिसटेंट था। हाइट एंडवांटेज के कारण अफ्रीकी गेंदबाज ज्यादा बाउंस निकाल पाए। यानी, भारतीय बल्लेबाजों को साउथ अफ्रीकी बल्लेबाजों की तुलना में ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

साउथ अफ्रीका को कम समय में दो बार रोलर लेने का मौका मिला
भारत की पिचों पर चौथी पारी खेलने वाली टीमें लाइट रोलर लेती हैं। इसके पीछे लॉजिक यह होता है कि हैवी रोलर से पिच की ऊपरी सतह के बिखरने की आशंका ज्यादा होती है। साउथ अफ्रीका में मामला उलटा होता है। वहां की पिचों सख्त होती हैं, इसलिए बिखरती नहीं हैं। साउथ अफ्रीका की पिचों पर क्रैक आता है। हैवी रोलर लेने से ये क्रैक पहले दो घंटे के लिए काफी दब जाते हैं।

रोलर लेने की इजाजत बैटिंग करने वाली टीम को पारी शुरू करने से पहले और दिन के खेल की शुरुआत से पहले मिलती है। साउथ अफ्रीका ने तीसरे दिन पारी की शुरुआत से पहले हैवी रोलर लिया। फिर 40 ओवर की बैटिंग की और फिर चौथे दिन की शुरुआत में फिर उसे रोलर लेने का मौका मिल गया। यानी, साउथ अफ्रीका की दूसरी पारी में ज्यादातर समय तक पिच के क्रैक खेल में आ ही नहीं पाए।

मौसम ने गेंद की धार कम कर दी
आमतौर पर आसमान में छाए बादल तेज गेंदबाजों के लिए मददगार होते हैं। इससे गेंद ज्यादा स्विंग होती है, लेकिन बारिश हो जाने और आउटफील्ड गीली होने पर मामला उल्टा हो जाता है। फिर गेंद गीली होती है और स्विंग-सीम मूवमेंट बंद हो जाती है। चौथे दिन भारतीय गेंदबाजों के साथ यही हुआ। कम हाइट और पिच पर रोलर चलने से बाउंस वैसे भी कम हो गई। साथ ही गीली आउटफील्ड के कारण मूवमेंट मिलना भी बंद हो गया।

राहुल की कमजोर कप्तानी ने रही-सही कसर पूरी कर दी
चौथे दिन की शुरुआत में साउथ अफ्रीका को जीत के लिए 122 रन चाहिए थे। उसके 8 विकेट बचे थे। दोनों छोर से तेज गेंदबाजों का इस्तेमाल करने की जगह कप्तान केएल राहुल ने एक छोर से अश्विन को मोर्चे पर लगा दिया। इससे अफ्रीकी बल्लेबाजों को फिर से सेट होने का मौका मिल गया। पहली पारी में सात विकेट लेने वाले शार्दूल ठाकुर को भी राहुल ने मोर्चे पर काफी देरी से लगाया।

इन तमाम फैक्टर्स ने दूसरे टेस्ट में भारत की हार की कहानी लिखी। अब सीरीज का फैसला केपटाउन में होने वाले तीसरे टेस्ट से होगा। वहां भारतीय टीम अब तक एक भी टेस्ट नहीं जीत पाई है।

हालांकि, यह सीरीज ऐसे लम्हों का गवाह बन रही है जो पहले कभी नहीं हुए। जैसे सेंचुरियन में भारत की पहली जीत। जोहान्सबर्ग में साउथ अफ्रीका की टीम इंडिया पर पहली जीत।

तो केपटाउन में भी भारत की पहली जीत दर्ज हो जाए तो हमें हैरान नहीं होना चाहिए। ट्रेंड बनते ही हैं टूटने के लिए।