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भास्कर इंटरव्यू- दीपा मलिक:समाज की नकारात्मक सोच को दूर करने के लिए खेलना शुरू किया, नए भारत में जल्द खत्म होगा भेदभाव

नई दिल्ली5 दिन पहले

जिद... जुनून... जज्बात... इन तीन चीजों के बिना सफलता हासिल नहीं कर सकते हैं। इसका सटीक उदाहरण हैं पैरालिंपिक मेडलिस्ट दीपा मलिक। 51 साल की दीपा लकवा ग्रस्त होने के बाद खेल से दूर हो गई थीं, लेकिन उनका खेल से ऐसा लगाव था कि 36 की उम्र में वापसी की और 46 की उम्र में देश को पैरालिंपिक में मेडल दिलाया। उन्होंने कहा, "मैंने समाज की नकारात्मक सोच को दूर करने के लिए खेल का सहारा लिया। उम्र, दिव्यांगता, लड़का-लड़की का फर्क नहीं होना चाहिए। जानते हैं दीपा के खेल के सफर के बारे में...

सवालः आपके लकवाग्रस्त होने के बाद लोगों की सोच भी बदल गई होगी, इसे आपने कैसे तोड़ा? ​​​
जवाबः खेल से मुझे पहचान मिली। 30 साल की उम्र में लकवा ग्रस्त हुई और फिर सर्जरी हुई। इसके बाद सबने ये साेच लिया था कि दो बच्चों की मां, पत्नी और एक अच्छी गृहणी नहीं बन पाएगी। मेरी पहचान बस एक बीमार महिला की रह गई थी। लोग सोचते थे कि ये महिला एक कुर्सी पर अपनी जिंदगी घसीटेगी और एक कमरे में बंद होकर खत्म हो जाएगी। लेकिन समाज की नकारात्मक सोच को दूर करने के लिए खेल का सहारा लिया और 36 साल की उम्र में फिर से वापसी कर मेडल दिलाया।

सवाल- शुरुआत में आपको कौन सा खेल पसंद था?
जवाबः सबसे पहला गेम स्विमिंग था। 40 की उम्र में जैवलिन थ्रोअर बन गई। इसके बाद 46 साल की उम्र में शॉटपुट में देश को रियो पैरालिंपिक में सिल्वर मेडल दिलाया।

देश में लड़के-लड़कियों में आज भी फर्क किया जाता है। इसके बारे में आपका क्या कहना है?
खेलों की शुरुआत एक पहचान ढूंढने के लिए हुई। ऐसी पहचान, जिसमें मुझे फिट समझा जाए। उम्र, दिव्यांगता, लड़का-लड़की में फर्क ये सब बहाने हैं। ये बहाने तब आते हैं, जब आप खुद पर भरोसा नहीं कर सकते। सीखने की शक्ति को खत्म कर देते हैं। मैंने अपनी दिव्यांगता और उम्र को बेड़ियां नहीं बनने दिया। मैंने उसमें अपनी मेहनत के रंग भरे।

सवालः खेल का माहौल बनाने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाबः 80 प्रतिशत भारत गांव में रहता है। ग्रास रूट की बात करें तो हमें रूरल इंडिया की बात करनी होगी। रूरल इंडिया की बात करें तो शिक्षा की बात करनी होगी। जितना समाज शिक्षित होगा, उतनी धारणा भी अच्छी होगी। देश की तरक्की देखना चाहते हैं तो महिलाओं को जोड़ना जरूरी है। महिलाओं को दायित्व समझाना होगा कि देश की उन्नति में योगदान देना है।

सवालः लड़के-लड़कियों में होने वाले भेदभाव को कैसे रोका जा सकता है?
जवाबः जब लड़कियां खेलने निकलती हैं तो उन्हें अलग-अलग बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पॉलिसी और संविधान में कोई फर्क नहीं है। यह इंसानी सोच है। महिलाएं बड़े टूर्नामेंट में मेडल जीत रही हैं। नए भारत में भेदभाव जल्द खत्म हो जाएगा।

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