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1 किमी व्हीलचेयर पर अभ्यास को जातीं, दुबई व कजाकिस्तान में जीते मेडल

एक वर्ष पहले
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ये कहानी है पुरखास गांव की बहू गीता गुलिया की। दो बच्चों की मां गीता पैरों से दिव्यांग है, लेकिन साल 2016 के बाद से भूल गई कि वह दिव्यांग है, वेट लिफ्टिंग में कुछ माह कड़ा अभ्यास करने के बाद उसने पहली बार में ब्राउंज मेडल जीता। इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब तक 2 बार नेशनल में गोल्ड मेडल जीत चुकी है। वल्र्ड चैंपियनशिप में पाॅजिशिन नहीं लग सकी। लेकिन हार को भुलाकर गीता घर से 1 किलोमीटर दूर व्हीलचेयर पर प्रैक्टिस करने जिम में जाती हैं। उनका कहना है कि देश के लिए कुछ करना चाहती हैं।

ऐसे हुई शुरुआत

गीता ने बताया कि वर्ष 2016 में वह घर पर काम कर रही थी। गांव का ही सुरजीत रोहिल्ला आया तो उसने देखा कि खेलों में आगे तक जा सकती है। कोसिस करे तो सफलता मिल सकती है। अगले दिन से ही जिम में जाकर अभ्यास किया तो उसने 40 किलो तक वजन उठा लिया था। पैरों में दिक्कत है, लेकिन उनके हौसले बुलंद होने से हिम्मत बढ़ी। उन्होंने बताया कि दुबई व काजिस्तान में दो गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।

हर कदम पर प|ी के साथः रमेश | रमेश गुलिया ने बताया कि सिलाई का काम करने के साथ ही थोड़ी बहुत खेती बाड़ी करते हैं। लेकिन, गीता के जहां खेल की बात आती है तो वे एक कदम आगे होकर उसका सहयोग करते है। बतौर राजेश व गीता के पैर में दिक्कत है।

दंपति पैरों से दिव्यांग


31 वर्षीय गीता व उनके पति रमेश दोनों पैरों से दिव्यांग है। इनके पास एक लड़का व एक लड़की ये दो बच्चें है। रमेश कपड़े सिलने का काम करता है। गीता भी चुल्हा-चाैका करने के साथ खेत में काम करने के अलावा जिम व घर पर सुबह-शाम दाे से तीन घंटे तक अभ्यास करती है। डाइट में दूध, घी व दही लेती है। गीता के बेटे को रेसलिंग का शाैक हैं।


हौसला जो हार नहीं माना

दो बच्चों की मां गीता गुलिया ने पैर से दिव्यांग होने पर भी वेट लिफ्टिंग में बनाई पहचान

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