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1948 से रेलवे स्टेशन के नजदीक हो रहा होलिका दहन
रेलवे स्टेशन के नजदीक शहर की सबसे बड़ी होलिका लगाई जाती है। आजादी के एक साल बाद वर्ष 1948 में स्व. लाला जाधू राम ने यहां होलिका लगाने की शुरुआत की थी। तब से लेकर यहां होलिका की पूजा की जाती है। इसके साथ महिलाओं की विशेष आस्था जुड़ी है। पूजा पंडित शिवम कराते हैं। सोमवार को यहां काफी संख्या में महिलाओं ने पूजा अर्चना की। सूत के धागे के साथ परिक्रमा की। इसकी ऊंचाई आठ से 10 फुट के बीच रहती है।
पंडित शिवम बताते हैं कि स्व. लाल जोधू राम ने शुरुआत की थी। उस समय यहां खुला स्थान था। गलियों में होलिका दहन नहीं किया जा सकता इसलिए रेलवे स्टेशन के नजदीक स्थान चुना गया। तब से शुरू हुई होलिका बनाने की परंपरा चल रही है। ढोल की थाप के साथ पूजा की जाती है। पूजन सामग्री में बेर, केला और अन्य फल चढ़ाए गए। पूजा करने आई संगीता ने बताया कि पहले वे सास के साथ पूजन करने आती थी। अब वे नहीं रही तो बच्चों के साथ पूजन पर आती है। इस दिन वे व्रत भी करती है। माना जाता है कि यह व्रत संतान काे दीर्घायु प्रदान करने वाला होता है। जिस प्रकार उनको कथा में सुनाया गया है। उनके साथ आई सोनिया ने भी बताया कि उनकी गली के नजदीक छोटी होलिका बनाई जाती है, लेकिन उनकी आस्था इसके साथ जुड़ी है। इसलिए वे यहां पूजन के लिए हर साल आती है। विधि विधान से पूजा की जाती है। अगर किसी को पूजन विधि नहीं पता तो यहां पंडित होते हैं, जो मंत्रोच्चारण के साथ पूजन कराते हैं। इनके साथ ही बहुत महिलाएं पूजा कर परिवार के लिए सुख समृद्धि की कामना करती हैं।
यमुनानगर | ढोल की थाप पर होलिका पूजन करते लोग।