मॉडर्न पैरेंटिंग, फिजिक्स की तरह है
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु [raghu@dbcorp.in]
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न्यू टन के तीसरे नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के लिए, एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। और यह कम से कम आधुनिक पैरेंटिंग के मामले में सही प्रतीत होता है। ‘क्या आप प्रश्न-पत्र लीक कर सकते हैं?’ यह सवाल उन कई अनपेक्षित सवालों में से एक था, जो इंटरमीडिएट सार्वजनिक परीक्षाओं के दौरान छात्रों को तनाव से निपटने में मदद करने के लिए आंध्र प्रदेश राज्य शिक्षा बोर्ड के साथ काम करने वाले काउन्सलर्स से पूछे गए थे। ऐसा एक और सवाल था जिसने मनोवैज्ञानिकों को चौंका दिया था कि ‘मैंने पूरा साल पबजी खेलने में बर्बाद कर दिया, अब मुझे अच्छे मार्क्स के लिए क्या करना चाहिए?\\\'
ऐसा किसी एक राज्य तक ही सीमित नहीं है। कई राज्यों के छात्र तनावग्रस्त बच्चों की मदद करने के लिए राज्यों द्वारा जारी किए गए स्थानीय मनोवैज्ञानिकों के नंबर पर कॉल लगाते हैं, जिनका एक ही उद्देश्य होता है- अच्छे मार्क्स स्कोर करने का आसान तरीका क्या है, जबकि कुछ बच्चे किसी भी कीमत पर केवल पास होना चाहते हैं।
ये मनोवैज्ञानिक स्वीकारते हैं कि केवल अकादमिक रूप से कमजोर छात्र ही मदद नहीं मांग रहे हैं, बल्कि अच्छे मार्क्स वाले छात्र भी मदद ले रहे हैं, जो वास्तव में काफी तनाव में हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों के ऐसे छात्र भी हैं जो मनोवैज्ञानिकों से यह जानना चाहते हैं कि वे अपने माता-पिता या शिक्षकों की अपेक्षाओं पर खरे उतर पाएंगे या नहीं। एक छात्र कॉल पर यह कहते हुए रोने लगा कि वह गणित में हमेशा टॉप करता है, इसलिए उसके शिक्षक को उससे बोर्ड परीक्षाओं में भी ज्यादा नंबर लाने की उम्मीदें हैं। दिलचस्प बात यह है कि 10वीं की बोर्ड परीक्षाओं में राज्य के टॉपर्स को डर था कि वे 12वीं की परीक्षा में टॉप नहीं कर पाएंगे। हालांकि कॉल करने का समय दोपहर 3 बजे से शाम 8 बजे के बीच है, लेकिन कई बार छात्र आधी रात को फोन करते हैं, ताकि उनके माता-पिता को पता न चले कि वे तथाकथित ‘बाहरी लोगों’ से मदद मांग रहे हैं। कुछ बच्चों ने केवल जोर से रोने और परीक्षा के लिए अपने डर को भगाने के लिए फोन किया, जबकि उन्हें यकीन था कि वे पास तो हो ही जाएंगे। लेकिन उनके लिए सिर्फ पास होने से ज्यादा अच्छे प्रतिशत लाना मायने रखता था।
क्या आपने कभी सोचा है कि छात्रों के बीच पिछले कुछ वर्षों में यह नया भ्रम क्यों आ गया है। क्यों होशियार बच्चों में यह आत्मविश्वास नहीं है कि वे माता-पिता और शिक्षक की उम्मीद पर खरे उतर सकते हैं, जबकि कुछ बच्चे बेहतर अंकों के लिए शॉर्टकट ढूंढ रहे हैं। दोनों ही स्थितियों में छात्रों के लिए अंक मायने रखते हैं।
हाल ही में मेरी उन माता-पिता के साथ मीटिंग थी, जिनके बच्चे अभी नर्सरी या किंडरगार्टन में हैं। आप हैरान हो जाएंगे कि उन्होंने मुझसे कैसे-कैसे सवाल पूछे। जैसे कि ‘पिछले एक महीने से नर्सरी में होने के बावजूद बच्चा माता-पिता की मदद के बिना ए टू जेड नहीं बोल पाता’। दूसरे माता-पिता का कहना था कि ‘मेरा बेटा अंग्रेजी में पहले चार अल्फाबेट्स से अधिक क्यों नहीं लिख पा रहा है? सवाल सिर्फ अकादमिक ही नहीं थे। दूसरे माता-पिता की भी सुनें: ‘मेरे बच्चे को फैंसी ड्रेस में पुरस्कार क्यों नहीं मिला। आखिरकार वो पुरस्कार जीतने के लिए ही तो स्कूल जाता है।’ इतना ही नहीं एक मां ने स्कूल प्रबंधन के साथ जमकर लड़ाई की, जब उनकी तीन वर्षीय बेटी की नर्सरी कक्षा के सभी 40 बच्चों के एक डांस के कार्यक्रम में बच्ची को पीछे खड़ा किया गया था। उनका सवाल यह था कि उनकी बेटी को सबसे आगे खड़े करने की बजाय डांस ग्रुप के बीच में क्यों खड़ा किया गया था।
अब मुझे बताएं कि अगर हम माता-पिता ही इस तरह बर्ताव करेंगे, यह सुनिश्चित करने के लिए कि हमारे बच्चे डांस प्रोग्राम में सबसे आगे खड़े हों, तो कल्पना कीजिए कि बच्चे स्कूल की परीक्षा देते वक्त कितना दबाव महसूस करते होंगे।
फंडा ये है कि पैरेंटिंग, फिजिक्स की तरह है। माता-पिता की हर क्रिया की एक समान प्रतिक्रिया होती है। यदि आप पहले दिन से ही हर काम में पहले नंबर पर आने को महत्व देंगे, तो स्कूल खत्म होने तक सिर्फ अंक ही महत्वपूर्ण रह जाएंगे। फैसला आपका है।
मैनेजमेंट फंडा**