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3 साल की थी पैराें ने काम करना छाेड़ा, मां गाेदी में लेकर जाती थी स्कूल, 8वीं में 6 ऑपरेशन हुए पर हार नहीं मानी

एक वर्ष पहले
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सफलता का मूल मंत्र दृढ़ इच्छा शक्ति है। मनुष्य जीवन में शक्ति का बहुत बड़ा हाथ रहा है। मनुष्य मन में ठान ले तो कोई भी मुकाम कड़ी मेहनत से प्राप्त किया जा सकता है। इसका उदाहरण है दिव्यांग टीचर विजय लक्ष्मी जिन्होंने कड़ा संघर्ष कर मुकाम हासिल किया है।

तीन साल की उम्र में किसी बीमारी के कारण पैराें ने काम करना छाेड़ दिया। उनकी माता सुनीता देवी उन्हें गांव ऐंचला के प्राथमिक स्कूल में गोद में लेकर जाती थी। 8वीं तक एेसे ही चला। 8वीं कक्षा में दो टांगों के छह ऑप्रेशन हुए। एक साल तक बैड रेस्ट करना पड़ा, जिसके बाद पढ़ाई तो दूर की बात चलना भी मुश्किल था, लेकिन लक्ष्मी ने हार नहीं मानी। जीवन में कुछ बनने की जिद थी। स्टिक के सहारे चलना सीखा। 5वीं गांव से पास की। इसके बाद करनाल शहर में राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय रेलवे रोड स्कूल से 12वीं की।

केवीए डीएवी कॉलेज में ग्रेजुएट व पंडित चिरंजीलाल शर्मा महाविद्यालय में पोस्ट ग्रेजुएट की। 8 साल तक छात्राओं को घर पर ही निशुल्क शिक्षा दी। एमकॉम के बाद नेट, एचटेट, पीजीटी कर कॉलेज में बच्चों काे बताैर काॅमर्स की लेक्चर बच्चों काे पढ़ा रही हैं। पिछले ढाई साल से पंडित चिरंजीलाल शर्मा महाविद्यालय में लगीं हैं।

10 मीटर पिस्टल शूटिंग स्टेट में गोल्ड व पैरा के टॉप-10 में रैंक प्राप्त की

विजय लक्ष्मी ने बताया कि दिव्यांग होने के बाद स्पोर्ट्स में अच्छा खिलाड़ी बनने के लिए मेहनत की। शूटिंग खेल को चुनते हुए कई माह तक 10 मीटर शूटिंग की प्रेक्टिस की। 2018 जून-जुलाई में राज्यस्तरीय पानीपत शूटिंग प्रतियोगिता में गोल्ड व केरल में पैरा में टॉप-10 में आठवां स्थान प्राप्त किया। विजय लक्ष्मी ने कहा कि हर व्यक्ति में कोई कला होती है, केवल उस कला को बाहर निकालकर प्रतिभा निखारने की जरूरत होती है।


मंत्र: युवाअाें काे कड़ी मेहनत करनी चाहिए

विजय लक्ष्मी ने बताया कि जीवन में कड़ा संघर्ष कर टीचर बनीं। युवाओं काे जीवन में सफल हाेने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर हैं। महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। अाने वाला समय महिलाओं का है।

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