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होली के रंगों का भी यही कहना है, हर चेहरे पर कुछ मुस्कान जरूरी है

एक वर्ष पहले
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हिंदी साहित्य प्रेरक संस्था की ओर से बाल भवन में होली के रंग अपनों के संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभिन्न कवियों ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की। इस अवसर पर सारिका ने कहा कि दरवाजे पर उसी जगह आज मैं खड़ी हूं, जहां कभी तुमने अपने निशान छोड़े। शकुंतला काजल ने कहा कि मैं बन जाऊं थारी राधिका, थे म्हारो घनश्याम जी। राजेश भेंट ने कहा कि एक बरस में आया त्योहार, खुशियों की लाया बौछार। अश्विनी कुमार ने कहा कि कल जो प्यार के खत लिखते थे, आज बीमे के फाॅर्म भरने लगे हैं। पर हकीकत है ये सब दोस्त थकने लगे हैं।

देवदत्त देव ने कहा कि भीगी पलकों से फूल दिया था पिछली होली को, मुझसे मिलने का कॉल किया था पिछली होली को। सचिव जितेंद्र नाथ ने कहा कि घर से बाहर सड़क बनी तो दिल खुश हो गया, कितना चलेगी पूछा तो उनका सर लाल हो गया। राजकुमार वर्मा ने कहा कि हमारी सभ्यता का प्रतिमान है होली, हमारी संस्कृति का दिलमान है होली। एमआर सेठी ने कहा कि घर में बीबी रोज बचाती, मुझ पर अपना हुक्म चलाती, और बज लाता मैं फोरन, जो आदर्श वो मुझे सुनाती। मंजू मानव ने कहा कि जिसके पड़े थे कीड़े, रोया वो रात भर, लट्ठ ले गया था साथ जो सोया वो रात भर। अध्यक्ष नरेंद्र संतोषी ने कहा कि चिंताओं का गर समाधान जरूरी है, तो फिर गीता का भी ज्ञान जरूरी है। होली के रंगों का भी यही कहना है, हर चेहरे पर कुछ मुस्कान जरूरी है।

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