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लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग जलवायु परिवर्तन के लिए नया खतरा, 2018 में 30 करोड़ टन CO2 का उत्सर्जन हुआ

2 वर्ष पहले
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  • 0.2 ग्राम से 7 ग्राम के बीच कार्बन का उत्सर्जन करती है एक गूगल सर्च
  • 08 प्रतिशत तक उत्सर्जन होने की संभावना है डिजिटल टेक्नोलॉजी से 2025 तक

गैजेट डेस्क. देश-दुनिया में लोगों में वीडियो स्ट्रीमिंग का ट्रेंड बढ़ रहा है। ओरिजनल और नए प्रकार का कंटेंट होने के कारण इन्हें काफी पसंद किया जा रहा है। इन प्लेटफॉर्म द्वारा अपना कंटेंट किसी के साथ ना शेयर करने के कारण इनकी डिमांड बनी रहती है। लेकिन एक हालिया स्टडी के मुताबिक लगातार स्ट्रीमिंग सर्विसेस पर वीडियो देखने का शौक आपके आसपास के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। विशेषज्ञों ने लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग को जलवायु परिवर्तन के लिए नया खतरा बताया है। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि हम छह किलोमीटर तक कोई वाहन चलाकर जितना कार्बन उत्सर्जन करते हैं, उतना सिर्फ वीडियो स्ट्रीमिंग से आधे घंटे की फिल्म देखने से हो जाता है।
 
फ्रांस की शोध संस्था शिफ्ट प्रोजेक्ट में बताया गया है कि पिछले साल ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग से उतना कार्बन उत्सर्जित हुआ जितना की सालभर में स्पेन में होता है। इसके अगले छह वर्षों में दोगुना होने की आशंका है। इसमें सबसे अधिक 34 फीसदी लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और हुलु से हो रहे हैं। देखा जाए तो दुनियाभर में नेटफ्लिक्स का लगातार विस्तार हो रहा है। वर्ष 2017 और 2018 के बीच कंपनी के वैश्विक स्ट्रीमिंग सब्सक्रिप्शन के राजस्व में 53 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

1) वीडियो स्ट्रीमिंग में 6 गुना ज्यादा वक्त बिता रहे यूजर्स

आईटी सेक्टर की ऊर्जा दोहन पर नजर रखने वाली संस्था ग्रीनपीस के गैरी कुक का कहना है कि डिजिटल वीडियो बहुत बड़े आकार की फाइल में आते हैं। वीडियो की गुणवत्ता बेहतर होने के साथ इनका आकार भी बड़ा होता जा रहा है। स्ट्रीमिंग सेवाओं के लिए आवश्यक अधिकांश ऊर्जा का उपयोग डेटा सेंटर द्वारा किया जाता है, जो कम्प्यूटर या डिवाइस को डेटा डिलीवर करता है। नेचर पत्रिका में छपे एक लेख के मुताबिक ऐसे डेटा सेंटर दुनियाभर के कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जन में 0.3% की हिस्सेदारी रखते हैं। जो वक्त से साथ और अधिक बढ़ने की आशंका है। इस बीच, वीडियो देखने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरणों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है। कंज्यूमर टेक्नोलॉजी एसोसिएशन के मुताबिक औसत स्क्रीन साइज 1997 में 22 इंच (55 सेंटीमीटर) से बढ़कर 2021 तक 50 इंच हो जाएगा। नेचुरल रिसोर्स डेफेंस काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, 4K रिज़ॉल्यूशन वाली स्क्रीन हाई-डेफिनेशन स्क्रीन की तुलना में लगभग 30% अधिक ऊर्जा का उपयोग करती है।

अमेरिकी ऊर्जा विभाग के डेटा सेंटर विशेषज्ञ डेल सर्टर का दावा है कि अगले 10 साल तक ऊर्जा की खपत जस की तस रखने के लिए आईटी और डेटा सेंटर के उपकरण में सुधार करना जरूरी है। विशेषज्ञों ने सुझाव देते हुए कहा कि है दर्शकों को ऑटोप्ले मोड को डिसेबल कर वाईफाई पर लोअर डिफिनेशन में लाइव वीडियो देखनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि मोबाइल पर 3जी में लाइव वीडियो देखना सबसे खतरनाक है।

शहरी कस्टमर्स ने डीटीएच या केबल की जगह ओवर-द-टॉप सर्विसेज पर स्विच किया है। एमएक्स प्लेयर, नेटफ्लिक्स, ऐमजॉन प्राइम विडियो और हॉटस्टार जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म्स अब सब्सक्राइबर्स को पसंद आ रहे हैं। भारत में एमएक्स प्लेयर के पास सबसे ज्यादा 21 प्रतिशत कस्टमर्स हैं, इसके बाद ऐमजॉन के पास 15 प्रतिशत और नेटफ्लिक्स और हॉटस्टार के पास 14-14 प्रतिशत कस्टमर बेस मौजूद है। जी एंटरटेनमेंट के जी5 ऐप, स्टार इंडिया के हॉटस्टार और सोनी के सोनी लिव ओटीटी सर्विसेस का असर भी डीटीएच सब्सक्राइबर बेस पर पड़ रहा है। ट्राई की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि डीटीएच सर्विस का एवरेज ऐक्टिव सब्सक्राइबर बेस इस साल की पहली तिमाही जनवरी-मार्च में लगभग 7.2 करोड़ यूजर्स का था। 30 जून को खत्म तिमाही तक इसमें 25 प्रतिशत की गिरावट देखी गई और लगभग 5.4 करोड़ ऐक्टिव डीटीएच सब्सक्राइबर्स बचे हैं। डीटीएच से कम होते ग्राहकों की संख्या के पीछे एक कारण ये भी माना जा रहा है कि टेलिकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा लागू किया गया ब्रॉडकास्टिंग का नया नियम रास नहीं आ रहा है। पहले माना जा रहा था कि ऐसा होने के बाद सब्सक्राइबर्स को कम पैसे अपने प्लान के लिए चुकाने होंगे लेकिन इसका उल्टा ही हुआ। बेसिक से लेकर प्रीमियम प्लान्स तक महंगे हो गए और चैनल चुनने की जगह चैनल पैक चुनने का विकल्प सब्सक्राइबर्स को मिला, जो उन्हें रास नहीं आया।

ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स के आने के बाद से दुनिया के तमाम देशों में टेलीविजन देखने वालों की संख्या घटी है। भारत में भी डिजिटल कंटेंट की खपत तेजी से बढ़ रही है क्योंकि अब लोगों को मनपसंद शो, सीरियल या मूवीज के लिए ड्राइंग रूम में टीवी के सामने बैठने की जरूरत नहीं है। वे अब ओटीटी प्लेटफॉर्मों की मदद से कहीं भी, कभी भी, कोई भी शो/सीरियल/मूवी/न्यूज देख सकते हैं। इंडस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, दर्शक पांच वर्ष पहले एक हफ्ते में तकरीबन 100 अरब मिनट तक ऑनलाइन कंटेंट देखते थे, जो अब बढ़कर 600 अरब मिनट प्रति सप्ताह हो गया है। यानी अब वे ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर छह गुना ज्यादा वक्त बिताने लगे हैं। इस दौरान स्मार्टफोन और डेटा, दोनों ही सस्ते हुए हैं। पहले 40 करोड़ मोबाइल ही ओटीटी को सपोर्ट करते थे। अब यह संख्या 100 करोड़ हो गई है। इसकी बदौलत ओटीटी प्लेटफॉर्मों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। वहीं, ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) के आंकड़ों के मुताबिक भारत के सिर्फ 66 पर्सेंट यानी करीब 19.7 करोड़ घरों तक टीवी की पहुंच है। इंडस्ट्री को अगले पांच सालों में इसके बढ़कर 23-25 करोड़ होने का अनुमान है। यहां लोग रोजाना औसतन 3.4 घंटे टीवी के सामने बिताते हैं। इसके अगले पांच सालों में बढ़कर 4 से 4.5 घंटे रोजाना तक पहुंचने की संभावना है।

87 प्रतिशत लोग बिजनेस वीडियो को मार्केटिंग टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह 2017 में 63% था और 2018 में 81 प्रतिशत के करीब था। एक रिपोर्ट के अनुसार 96 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वह किसी प्रोडक्ट की सर्विस और इस्तेमाल को सीखने के लिए ऑनलाइन वीडियो को देखना पसंद करते हैं। टेक्सट और इमेज की तुलना में सोशल मीडिया पर वीडियो को 1200% ज्यादा शेयर किया जाता है। भारत में ओटीटी मार्केट 2023 तक 3.60 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार 2018 तक यह मार्केट 35 हजार करोड़ रुपए का था। इंटरनेट की बढ़ती स्पीड और स्मार्टफोन यूजर बढ़ने की वजह से भारत में ओटीटी मार्केट 15% की तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। 2025 तक इसका वैश्विक मार्केट 17 फीसदी की रफ्तार से बढ़कर 240 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा।

ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक दुनिया का सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन चीन में होता है। दुनिया में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन में 27 प्रतिशत योगदान चीन का है। इसके बाद अमेरिका (15 प्रतिशत) दूसरे और यूरोपीय यूनियन (10 प्रतिशत) तीसरे स्थान पर है। चौथे नंबर पर भारत (सात प्रतिशत) है। दुनिया के कुल उत्सर्जन में इन चार जगहों की 58 प्रतिशत हिस्सेदारी है। विश्व के बाकी देश समग्र रूप से 42 फीसद उत्सर्जन करते हैं।

  • 0.2 ग्राम से 7 ग्राम के बीच कार्बन का उत्सर्जन करती है एक गूगल सर्च, 7 ग्राम इतना होता है जिसमें आप एक केतली चाय को उबाल सकते हैं
  • 04 फीसदी उत्सर्जन दुनिया में डिजिटल टेक्नोलॉजी की वजह से हो रहा है, यह दुनिया में यह पूरे नागरिक उड्डयन क्षेत्र के छोड़े गए धुएं से ज्यादा है
  • 08 प्रतिशत तक उत्सर्जन होने की संभावना है डिजिटल टेक्नोलॉजी से 2025 तक
  • 30 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन हुआ 2018 में ऑनलाइन वीडियो से
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