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एक्सपर्ट एनालिसिस / खुफिया एजेंसियों को कम्प्यूटर जांचने का अधिकार मिलने से प्राइवेसी को खतरा क्यों?

Dainik Bhaskar

Dec 25, 2018, 07:00 AM IST


everything need to know about data interception
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  • सरकार ने 10 सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को पर्सनल कम्प्यूटर्स में मौजूद डेटा की जांच का अधिकार दिया
  • एक्सपर्ट के मुताबिक, सरकार विभिन्न माध्यमों से डेटा जुटाकर किसी भी व्यक्ति की प्रोफाइलिंग कर सकेगी

गैजेट डेस्क. देश की 10 बड़ी सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को किसी भी व्यक्ति या संस्था के कम्प्यूटर में मौजूद डेटा की जांच करने का अधिकार देने के केंद्र के फैसले का देशभर में विरोध हो रहा है। विपक्ष ने इसे अघोषित आपातकाल बताया है। वहीं, सरकार ने कहा है कि जिन नियमों के आधार पर एजेंसियों को ये अधिकार दिया गया है, वे 2009 में यूपीए सरकार के वक्त बने थे। एक्सपर्ट आकाश कुमार सिंह के जरिए भास्कर आपको बता रहा है कि एजेंसियां कैसे आपके पर्सनल कम्प्यूटर की जांच कर सकती हैं और सरकार के इस फैसले से प्राइवेसी का खतरा क्यों है? आकाश फ्री इंटरनेट और डिजिटल राइट्स के लिए काम करने वाली संस्था एक्सेस नाउ में साउथ एशिया पब्लिक पॉलिसी के फैलो हैं।

 

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एक्सपर्ट व्यू : 7 सवाल-जवाब में जानें इस फैसले से जुड़ी बातें

  1. किस एक्ट के तहत सरकार ने एजेंसियों को अधिकार दिया?

    आईटी एक्ट वर्ष 2000 में बना। इसमें यह प्रावधान है कि राष्ट्र की सुरक्षा, अखंडता या संप्रुभता के लिए सरकार चाहे तो किसी भी व्यक्ति या संस्था के कम्प्यूटर की निगरानी कर सकती है। हालांकि, निगरानी करने के लिए किन एजेंसियों को अधिकार दिया जाएगा, ये सरकार ही तय करती है। किसी भी कम्प्यूटर या इंटरनेट कम्युनिकेशन की निगरानी करना डेटा इंटरसेप्शन कहलाता है।

  2. क्या सिर्फ कम्प्यूटर की निगरानी होगी?

    आदेश में सरकार ने सिर्फ कम्प्यूटर की निगरानी की बात कही है, लेकिन इसमें लैपटॉप और डेस्कटॉप से लेकर मोबाइल और सारे डिजिटल डिवाइस आ जाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि सरकार ने संसद में कम्प्यूटर की परिभाषा बताते हुए कहा था कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक, मैग्नेटिक, ऑप्टिकल या अन्य हाईस्पीड डेटा प्रोसेसिंग डिवाइस जो लॉजिकल, अर्थमैटिक या मेमोरी संबंधी काम करती है, उसे कम्प्यूटर कहा जाता है।

  3. सरकार हमारा डेटा किन रूपों में हमसे मांग सकती है?

    इस आदेश के अनुसार, सरकार तीन काम कर सकती है। पहला- इंटरसेप्ट या टैप। दूसरा- हमारे डेटा की मॉनिटरिंग और तीसरा- हमारे मैसेज या सूचनाओं को डिक्रिप्ट करना।

  4. टैपिंग या मॉनिटरिंग तो पहले भी होती रही है, फिर हंगामा क्यों?

    इससे पहले जो टैपिंग या मॉनिटरिंग होती थी, वो टेलीग्राफ एक्ट के तहत होती थी। उसमें सिर्फ फोन टैपिंग करने का अधिकार था। अब आईटी एक्ट के तहत 10 सरकारी एजेंसियों को इलेक्ट्रॉनिक डेटा टैप या मॉनिटर करने का अधिकार मिल जाएगा। गृह मंत्रालय का यह आदेश फोन टैपिंग के दायरे से बहुत आगे जाता है। इस आदेश के तहत एजेंसियां आपके द्वारा सालों से गूगल पर सर्च किए गए डेटा की मांग कर सकती हैं। साथ ही आपके वॉट्सऐप, फेसबुक, ईमेल, आप किससे, कितना और क्या बात करते हैं, इसका डेटा आपसे मांग सकती है।

  5. इस आदेश से हमारी प्राइवेसी किस तरह से खतरे में है?

    आप रोज जितना भी डेटा इस्तेमाल करते हैं, उतना डेटा यह पता लगाने के लिए पर्याप्त है कि आपका व्यवहार, आपकी प्रवृत्ति क्या है, आपकी पसंद-नापसंद क्या है, आप किसके समर्थक और किसके विरोधी हैं? कुल मिलाकर आपके डेटा से प्रोफाइलिंग की जा सकती है।

  6. दरअसल, छोटे-छोटे इलेक्ट्रॉनिक डेटा को विभिन्न माध्यमों से लेकर एक ‘मेटा डेटा' बनाया जा सकता है, जो किसी भी व्यक्ति की प्रोफाइलिंग के लिए पर्याप्त है। इस प्रोफाइलिंग के जरिए, सरकार हर वो चीज कर सकती है, जिसे वो करना चाहती है। यह ठीक उसी तरह होता है, जिस तरह से कैम्ब्रिज एनालिटिका ने लोगों की प्रोफाइलिंग की थी।

  7. डेटा पहले से सोशल मीडिया पर मौजूद, फिर फर्क क्या है?

    इसके दो लॉजिक हैं। पहला- जो भी डेटा कंपनियों के पास है, वो कंपनियों, आधार जैसी कानूनी एजेंसियों, कोर्ट और संसद के निरीक्षण में है। वे इसका दुरुपयोग नहीं कर सकतीं। अगर करती भी हैं तो सरकार या कोर्ट डेटा प्रोटेक्शन नियमों का उल्लंघन करने पर उन कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।

  8. दूसरा- कंपनियों के पास हमारा डेटा लेने का एक ही माध्यम है- या तो उनका ऐप या फिर वेबसाइट। लेकिन सरकार सभी ऐप या वेबसाइट से डेटा ले सकती है, जिससे हमारा मेटा डेटा सरकार के पास आ जाएगा और इसी तरह सरकार सबसे बड़ी ‘डेटा एग्रीगेटर' बन जाएगी।

  9. तो क्या सरकार का ये आदेश गैर-कानूनी है?

    सरकार का ये आदेश आईटी एक्ट की धारा-69 (1) पर आधारित है, लेकिन अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने पुट्टास्वामी केस में फैसला देते हुए निजता को मौलिक अधिकार बताया था। सरकार का आदेश न सिर्फ निजता के मौलिक अधिकार पर खतरा है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन भी है।

  10. सरकार का आदेश आईटी एक्ट की धारा-69 (1) का उल्लंघन भी है। क्योंकि यह धारा सरकार को आम जनता की निगरानी के लिए असीमित शक्ति नहीं देती। यह सिर्फ जनता के हित या राष्ट्र की संप्रुभता या अखंडता को बनाए रखने के लिए कम्प्यूटर की निगरानी कर सकती है। लेकिन सरकार ने अपने आदेश में कहीं भी साफ नहीं किया है कि वो कम्प्यूटर की निगरानी क्यों और कब करेगी?

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