रिपोर्ट / काम के नहीं है ज्यादातर एंटी वायरस, 250 में से सिर्फ 80 हुए टेस्ट में पास

Dainik Bhaskar

Mar 17, 2019, 01:33 PM IST



most of the antivirus for android are not really helpful
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  • एंटी वायरस टेस्टिंग कंपनी एवी कंपेरेटिव्स की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है
  • टेस्ट किए गए 250 एप्स में से सिर्फ 23 ही मालवेयर को 100% डिटेक्ट कर पाए
  • रिपोर्ट में एपस्टोर पर मौजूद एंटी वायरस में से दो तिहाई एप काम के नहीं पाए गए

गैजेट डेस्क. कई स्मार्टफोन यूजर्स के लिए स्मार्टफोन की सेफ्टी के लिए मोबाइल में एंटी वायरस एप होना बहुत जरूरी है। लेकिन ऑस्ट्रिया की एंटीवायरस कंपनी एवी कंपेरेटिव्स की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि ज्यादातर एंटीवायरस एप किसी काम के नहीं होते। रिपोर्ट के अनुसार गूगल प्लेस्टोर पर एंड्राइड स्मार्टफोन के लिए उपलब्ध एंटीवायरस एप्स में से दो तिहाई से ज्यादा एप काम के नहीं हैं और उनपर भरोसा नहीं किया जा सकता।

 

एंड्राइड स्मार्टफोन के लिए गूगल एप पर मौजूद करीब 250 एंटीवायरस को स्टडी करने पर कंपनी ने पाया कि इनमें से 80 एप ही एक मालवेयर डिटेक्टिंग टेस्ट को पास कर पाई। पास हुई ऐप्स ने 2000 खतरनाक एप्स में से कम से कम 30% से ज्यादा को डिटेक्ट किया था। इन 80 एप्स में से भी ज्यादातर बिना किसी कारण भी वॉर्निंग देती हुई देखी गई। स्टडी में शामिल 250 एप में से सिर्फ 23 एप ऐसे निकले जिन्होंने मालवेयर को शत प्रतिशत डिटेक्ट किया।


दो हजार ऐप से की गई टेस्टिंग

कंपनी द्वारा टेस्ट किए गए एप्स की लिस्ट में अवास्ट, एवीजी, चीता मोबाइल, डीयू टेस्टर, बिटडिफेंडर, मैकफी और गूगल प्ले प्रोटेक्ट जैसे नाम भी शामिल हैं। कंपनी ने कोई इम्युलेटर इस्तेमाल करने की बजाय स्टडी के लिए सिलेक्टेड 250 एप्स को मैन्युअली टेस्ट किया। रिसर्चर्स ने एंटी वायरस एप्स को एंड्राइड मोबाइल में इंस्टॉल किया और फिर फोन में खतरनाक एप इंस्टॉल किए। टेस्टिंग प्रोसेस को दो हजार बार अलग अलग खतरे वाले एप के साथ दोहराया गया, जिसमें देखने को मिला कि ज्यादातर ऐप्स ने किसी भी वायरस या मालवेयर को डिटेक्ट नहीं किया। हालांकि कुछ ऐप्स ऐसे भी थे जिन्होंने फोन के लिए खतरे वाले ऐप को ब्लॉक कर दिया, वहीं कुछ ऐप्स ने पुराने मालवेयर डिटेक्ट किए लेकिन नए मालवेयर को ब्लॉक नहीं किया। मजेदार बात यह कि कुछ ऐप्स ने खुद को ही फोन के लिए खतरे वाले ऐप की तरह शो किया। रिसर्चर्स के अनुसार डेवलपर्स द्वारा खुद के ऐप के पैकेज को वाइट लिस्ट में नहीं डालना इसका कारण था।

 

एप रेंटिग या रिव्यू नहीं हैं सही पैमाने
रिसर्चर्स का कहना है कि यूजर्स को एप की रेटिंग देखकर उसके सही होने का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि हो सकता है कि रेटिंग देने वाले ज्यादातर यूजर्स को एप के प्रभावी होने या ना होने की जानकारी ही ना हो। 
रिसर्चर्स के मुताबिक डेवलपर एप के नकली रिव्यू भी डाल सकता है। और कोई स्कैम एप भी कई बार डाउनलोड किया जा चुका हो ऐसा संभव है, इसलिए एप की रेटिंग, रिव्यू या डाउनलोड नंबर को देखकर एप के सही होने का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। रिसर्चर्स ने यूजर्स को सलाह दी है कि वे जानी-पहचानी और नामी कंपनी के ऐप ही इस्तेमाल करें। 

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