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38.8 फीसदी महिला कैदियों को उम्मीद, जेल से रिहा होने के बाद समाज उनको अपना लेगा

3 वर्ष पहले
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पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ की जेलों में बंद करीब 2000 महिला कैदी हैं। इनमें से 38.8 फीसदी महिला कैदियों को उम्मीद है कि रिहा होने पर उनका परिवार और समाज उनको फिर से अपना लेगा। वहीं 32.5 फीसदी महिलाओं को लगता है कि उन्हें समाज से कोई उम्मीद नहीं है और वे समाज की परवाह भी नहीं करती हैं। उनको समाज से कोई लेना-देना नहीं है। वहीं 11.7 फीसदी महिला कैदियों को लगता है कि समाज उनको कैदी और अपराधी के धब्बे से कभी मुक्त नहीं करेगा। ये परिणाम इंस्टीट्यूट ऑफ कोरेक्शनल एडिमिनिस्ट्रेशन, चंडीगढ़ द्वारा महिला कैदियों के जीवन स्तर पर किए गए एक सर्वे में सामने आए हैं। ‘सर्वे ऑफ क्वालिटी ऑफ लाइफ ऑफ वुमन प्रिजनर्स’ रिपोर्ट को नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) निष्ठा जसवाल और डॉ. उपनीत लाली, डिप्टी डायरेक्टर, इंस्टीट्यूट ऑफ करेक्टिव एडमिनिस्ट्रेशन, चंडीगढ़ ने जारी किया। पंजाब में कुल कैदियों में 5 फीसदी ही महिला कैदी हैं और अंडर ट्रायल और सजा भुगत रहे कुल पुरुष कैदियों 22215 के मुकाबले उनकी संख्या 1153 ही है। वहीं हरियाणा में कुल पुरुष कैदियों 18257 के मुकाबले महिला कैदियों की संख्या 720 ही है। कुल कैदियों में उनकी संख्या 3.8 फीसदी ही है। इसके साथ ही सर्वे में शामिल महिला कैदियों में से 83.2 फीसदी ने कहा कि उनको किसी प्रकार का कोई रोग या स्वास्थ्य समस्या नहीं है।

पंजाब में संख्या घटी तो हरियाणा में बढ़ी
महिलाओं के पुनर्वास की सख्त जरूरत
महिलाओं के पुनर्वास की सख्त जरूरत है और जेलों में भी उनको बेहतर कानूनी सेवाएं प्रदान की जानी चाहिए। प्रो.(डॉ.) निष्ठा जसवाल, वाइस चांसलर, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, शिमला

पंजाब में जेलों में बंद महिला कैदी अभी भी फर्श पर सोती हैं। वहीं चंडीगढ़ और पंजाब में उनके लिए सीमेंट के बर्थ बनाए गए हैं। हिमाचल की एक जेल में तो स्लीपिंग मेट्रेस भी प्रदान किए गए हैं। डॉ. उपनीत लाली, डिप्टी डायरेक्टर, चंडीगढ़ इंस्टीट्यूट ऑफ कोरेक्शनल एडमिनिस्ट्रेशन

पंजाब में महिला कैदियों की संख्या साल 2018 के पहले छह महीने में 0.1 फीसदी कम हुई है, वहीं हरियाणा में ये 0.2 फीसदी बढ़ गई है।

शोध के कुछ प्रमुख परिणाम
40 फीसदी महिला कैदी अनपढ़ हैं।

50 फीसदी महिला कैदियों ने महसूस किया कि वे एक चिड़ियाघर जैसे हालात में रह रही हैं और वे महसूस करती हैं कि उन्हें जेल की चार दीवारों के भीतर सीमित कर दिया गया है।

संबंधित जेलों में कोई खेल या आउटडोर खेल भी नहीं थे।

20 % महिला कैदियों ने अपना समय नए कौशल सीखने में बिताया।

अधिकांश महिला कैदियों को जेल के अंदर अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं था।

उन्हें उनके द्वारा अर्जित मजदूरी की भी जानकारी नहीं थी।

महिला कैदियों के बीच सबसे बड़ा डर विवाद और अकेलापन था। प्रमुख चिंता उनके बच्चों और उनके भविष्य की थी।

महिला कैदियों में तनाव बहुत अधिक था। जेलों में परामर्श और पुनर्वास सुविधाएं करीब करीब न के बराबर थीं।

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