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‘ब्यूरोक्रेट्स हमसे चिढ़ते हैं, हमें भी वे पसंद नहीं ’

आम आदमी आर्मी की इज्जत करता है। आर्मी के होते हुए वह खुद को महफूज समझता है।

शायदा | Last Modified - Dec 09, 2017, 06:23 AM IST

‘ब्यूरोक्रेट्स हमसे चिढ़ते हैं, हमें भी वे पसंद नहीं ’

चंडीगढ़ .‘आम आदमी आर्मी की इज्जत करता है। आर्मी के होते हुए वह खुद को महफूज समझता है। लेकिन, ब्यूरोक्रेट्स हमसे चिढ़ते हैं। हम भी उन्हें पसंद नहीं करते।’ यह कह रहे थे ले. जनरल (रिटा.) विजय ओबेरॉय। वे चंडीगढ़ में चल रहे देश के पहले मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल में ‘इंडियन मिलिट्री एंड सोसाइटी’ विषय पर बात रख रहे थे। उन्होंने कहा कि जिस तरह ब्यूरोक्रेट्स को आर्मी के अफसरों से दिक्कत होती है, उसी तरह हमें भी वे भाते नहीं। हालांकि, अब तो आर्मी हेडक्वार्टर भी एक ब्यूरोक्रेटिक बॉडी की तरह हो गया है। ओबेरॉय को इस बात पर भी एतराज था कि आईएएस अफसर जब रिटायर्ड होता है तो उसके लिए लिखा जाता है फॉर्मर फलां फलां, लेकिन एक आर्मीमैन रिटायर हो जाए तो उसके पद के आगे तुरंत रिटायर्ड लगना शुरू हो जाता है। उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए ले. जनरल केजे सिंह ने एक डिफेंस सेक्रेटरी से हुई मुलाकात का जिक्र किया। कहा कि उस अफसर को आर्मी कोर के बारे में जानकारी नहीं थी। अफसरों को ट्रेनिंग देनी चाहिए कि आर्मी के साथ काम कैसे किया जाना चाहिए। ले. जनरल केजे सिंह का विचार था कि जैसे ब्यूरोक्रेसी और आर्मी के बीच गैप है, वैसा ही गैप राजनेताओं और आर्मी के बीच है।

एक्टर-प्लेयर राज्यसभा पहुंच जाते हैं तो हम क्यों नहीं?...नेताओं और आर्मी के बीच गैप कैसेकम हो? जनरल केजे सिंह बोले- राज्यसभा में आर्मी से दो लोगों को नॉमिनेट करना चाहिए। खुद वहां पहुंचेंगे तो सही बात कह सकेंगे। जब एक्टर, प्लेयर, सोशलवर्कर आिद राज्यसभा पहुंच सकते हैं तो हम क्यों नहीं जा सकते।’

टीवी पर तीन ही जनरल आते हैं, वे अपनी बात रखते हैं, हम सबकी नहीं
आर्मी की बात जनता तक नहीं पहुंचती। सरकार तक नहीं पहुंचती। इसके लिए क्या हो सकता है? ले. जनरल एचआरएस मान ने कहा-मीडिया ऐसा जरिया है जो हमारी आवाज बने। लेकिन, टीवी पर तो तीन जनरल ही नजर आते हैं। वे ही हर जगह अपनी बात रख रहे होते हैं, जो दरअसल हम सबकी बात होती भी नहीं। इस पर ले. जनरल केजे सिंह बोले- एक समय इस बात पर विचार किया गया था कि क्या सेना का अपना टीवी चैनल होना चाहिए? तो उस पर चर्चा में यही समझ आया कि ऐसा संभव नहीं है। आज चैनल्स या तो घाटे में हैं या बड़े कॉर्पोरेट द्वारा चलाए जा रहे हैं। ऐसे में आर्मी का अपना चैनल हो, फिलहाल ये बात सिरे चढ़ती दिखती नहीं दिखती।

ले. जनरल केजे सिंह ने कहा ऐसा भी नहीं है कि सारे ब्यूरोक्रेट्स बुरे हैं या उनके पास जानकारी की कमी है। लेकिन, इस बात में भी दो राय नहीं कि ज्यादातर ऐसे ही हैं। अच्छा हो कि उन्हें आर्मी का सिस्टम समझाने के लिए ट्रेनिंग दी जाए। ऐसे कोर्स होने चाहिए जिनसे वे समझ सकें कि आर्मी क्या है, कैसे काम करती है।

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