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पति के जाने बाद बनीं बस कडंक्टर बनी ये महिला, ये है इसके पीछे की कहानी

वुमंस डे पर हमने इन्हीं महिलाओं से बात की और उनसे जाना कि पुरुषों के क्षेत्र में काम करने के उनके अनुभव क्या हैं।

Dainik Bhaskar

Mar 08, 2018, 02:09 AM IST
कडंक्टर सुनीता रानी कडंक्टर सुनीता रानी

चंडीगढ़. इंटरनेशनल वुमन्स डे पर हम आपको बता रहे हैं ऐसी महिलाओं के बारे जिन्होंने पुरूषों के साथ खड़े होकर उनसे भी आगे निकल गई हैं। जी हां इस कड़ी में हम आपको बता रहे हैं ऐसी महिला के बारे में जो कि बस में कंडक्टर है और जिसका नाम सुनीता रानी है। इनकी ड्यूटी सुबह 8 :25 से शाम 6 बजे तक होती है।

- सुनीता बताती हैं- मैंने 7 जुलाई 2017 को यहां काम करना शुरू किया। पति भी कडंक्टर थे। ड्यूटी के दौरान अटैक आने से उनकी मौत हो गई।

- ऐसे में ऑफिसर और स्टाफ वालों ने मेरा साथ दिया। मुझे जॉब दी। कभी भी घर-परिवार को लेकर कोई परेशानी आती है तो मेरा स्टाफ पूरा सहयोग करता है।

- हर बस में एक मेल और फीमेल कंडक्टर हैं। मेरा मानना यही है कि औरतों को हर क्षेत्र में काम करने की आजादी है। इसलिए लड़कियों को पढ़ाना चाहिए, लड़का-लड़की में कोई भेदभाव न हो।

- मां-बाप को लड़कियों की शादी करने की बजाए सबसे पहले उनको पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बनाना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और अपनी पहचान बना सकें।

- मैंने अपने तीनों बच्चों में कभी भेदभाव नहीं किया। सभी को समान अधिकार दिए।

अफसाना खान अफसाना खान

हम घर ही नहीं पार्किंग भी चला सकते हैं

 

अफसाना सेक्टर-17 की  पार्किंग में काम करती हैं। जॉब का समय सुबह 11 से 8 बजे का है। बताती हैं- सेक्टर-25 में रहती हूं। 13 जून 2017 से मैंने यहां काम करना शुरू किया। शुरुआती दिनों में आस-पास के लोग और पार्किंग में आने वाले लोग यही कहते कि यह जॉब औरतों के लिए सही नहीं है। कुछ लोग तो यह तक बोले कि जब जॉब नहीं हो पाएगी तो खुद ही कुछ महीनों में छोड़कर चली जाएगी और आज यही बात बोलने वाले खुद अपनी जॉब छोड़कर घर बैठे हैं। औरतें हमें काम करता देख बेहद खुश होतीं है।

 

प्रोत्साहित भी करतीं हैं। इससे पता चलता है कि महिलाएं घर तो चलाती हैं इसके साथ पार्किंग को भी बेहतर ढंग से चला सकती हैं। गर्मी, सर्दी, बारिश में खड़े होकर काम करना आसान बात नहीं। कई बार थक भी जाते हैं तो कई बार जॉब छोड़ने का मन भी करता है लेकिन घर के हालात और सपने ऐसा होने नहीं देते। पिता साथ नहीं रहते, मां घर में खाना बनाती हैं। मुझसे छोटी तीन बहनें हैं जो पढ़ती हैं। मेरा सपना टीचर बनने का था लेकिन हालात की वजह से बारहवीं तक पढ़ पाई। अब सपना है कि एक बहन को टीचर बनाऊं।

संदीप कौर संदीप कौर

आज हमारी ड्यूटी है भाई

 

संदीप कौर सेक्टर-35 के किसान भवन के चौक पर ड्यूटी दे रही हैं। विधानसभा सेशन के चलते ट्रैफिक पुलिस की ड्यूटी वहां लगाई गई है। इसलिए उनकी जगह पुलिस महिला यहां उनकी ड्यूटी दे रही है।   

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