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जुगलबंदी इंटेलीजेंस अौर खुले दिलो-दिमाग का खेल है

जुगलबंदी इंटेलीजेंस अौर खुले दिलो-दिमाग का खेल है सिटी रिपोर्टर | चंडीगढ़ सराेद और वायलन की जुगलबंदी है तो...

Dainik Bhaskar

Feb 03, 2018, 02:00 AM IST
जुगलबंदी इंटेलीजेंस अौर खुले दिलो-दिमाग का खेल है
जुगलबंदी इंटेलीजेंस अौर खुले दिलो-दिमाग का खेल है

सिटी रिपोर्टर | चंडीगढ़

सराेद और वायलन की जुगलबंदी है तो अनोखी और मुश्किल, पर जो भी इसे सुनता है उसके मुंह से सिवा वाह के कुछ और नहीं निकलता। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों वाद्यों के स्वर भी बहुत खूबसूरत हैं। ऐसी ही एक परफॉर्मेंस शुक्रवार शाम टैगोर थिएटर में आयोजित, उत्तर दक्षिण कार्यक्रम में हुई। जहां सरोद प्लेयर पंडित तेजिंदर नारायण मजूमदार और वॉयलनिस्ट डॉ. मैसूर मंजूनाथ ने जुगलबंदी पेश की। पंडित तेजिंदर नारायण मजूमदार की मानें तो जुगलबंदी में एक प्लस एक दो नहीं, बल्कि एक होता है। यहां फोकस अपनी नहीं, हमारी परफॉर्मेंस पर होता है। दोनों ने रागम तारम पल्लवी और देश पेश किया। जुगलबंदी की यह जोड़ी 12 साल पुरानी है। पंडित तेजिंदर बताते हैं कि मैसूर से उनकी मुलाकात एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में हुई थी। वह जुगलबंदी के लिए किसी वायलिन प्लेयर को ढूंढ़ रहे थे। वहीं उन्हें किसी ने डॉ. मैसूर मंजूनाथ का रेफ्रेंस दिया। गुजरात स्थित आनंद में एक स्टूडियो में दोनों पांच मिनट के लिए मिले, वहीं राग और कंपोजीशन डिस्कस किया और रिकॉर्डिंग करा ली। आज तक की सबसे बेहतरीन रिकॉर्डिंग वही है। इसके लिए म्यूजिक से जुड़े कई लोग इन्हें सराह चुके हैं। इसके बाद दोनों ने यूरोपियन और अन्य देशों में कंसर्ट किए। डॉ. मैसूर के मुताबिक जुगलबंदी खुले दिलोदिमाग और इंटेलिजेंस का खेल है। बताते हैं कि हम दोनों की म्यूजिकल इंटिमेसी इतनी है कि अब ये मेरे अन्ना यानीकि बड़े भाई की तरह हैं। मैं इन्हें अधिकार से कहता हूं और वे भी मुझे हर बात प्यार से समझाते हैं। इन दोनों की परफॉर्मेंस के बाद विदुषि रुचि शर्मा और ख्याति शर्मा ने कथक परफॉर्म किया।

टैगोर थिएटर में परफॉर्मेंस करने पहुंचे पं. तेजिंदर नारायण मजूमदार और डॉ. मैसूर मंजूनाथ से बातचीत


मैं कोसता था कि मुझे ऐसे पापा क्यों मिले

डॉ. मैसूर चाइल्ड प्रॉडिजी हैं। वह बताते हैं कि सात साल की उम्र में पिता महादेव यप्पा से वायलिन सीखना शुरू किया। वे मेरे पिता और गुरु दोनों थे। तीन हफ्ते पहले उनका देहांत हुआ। मैसूर ने बताया कि उनके पिता ने सिस्टेमेटिक वायलिन प्लेइंग टेक्नीक डिजाइन की और उन्हें व उनके बड़े भाई को सिखाईं भी। वह उन्हें न खेलने के लिए बाहर जाने देते और न ही कोई मूवी देखनेे। सिर्फ संगीत में ही घेरे रखते थे। बोले- हम अकसर उन्हें कोसते थे। कहते थे कि भगवान ने हमें ऐसे पिता क्यों दिया। जब उनकी दी हुई विरासत के बूते दुनियाभर के बड़े-बड़े हॉल्स में परफॉर्म कर आया, तो एहसास हुआ कि कितना अच्छा किया मेरे पिता ने। बोले कि वायलिन एक यूरोपियन इंस्ट्रूमेंट है। पर वे जब-जब इसे विदेश में बजाते हैं तो लोग काफी पसंद करते हैं। लोग खड़े होकर और हम बैठकर इसे प्ले करते हैं। वह इसपर वेस्टर्न म्यूजिक और हम भारतीय सांस्कृतिक संगीत प्ले करते हैं। कहते हैं कि मैं चाहता हूं कि हमारे यंगस्टर्स जिस तरह माइकल जैक्सन के फैन हैं, उसी तरह अपने खूबसूरत भारतीय संगीत के भी हों।

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