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बंदनवार में छह टीमों ने पेश किया पंजाब का पारंपरिक काव्य ‘कविशरी’

जिस कुदरत चों जनमिया उस दे नाल ही वैर। हर इक रुख उदास है पत्ती-पत्ती जहर। यह वो पंक्तियां है जिससे जसप्रीत कौर और...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:05 AM IST

जिस कुदरत चों जनमिया उस दे नाल ही वैर। हर इक रुख उदास है पत्ती-पत्ती जहर। यह वो पंक्तियां है जिससे जसप्रीत कौर और उसके साथियों ने कविशरी की शुरुआत की। इसके अलावा भी पंजाब के अलग-अलग जगह से आई हुई टीम ने कविशरी पेश की, जो सामाजिक मुद्दों, धर्म, इतिहास पर आधारित रही। दरअसल, पंजाब साहित्य अकादमी और पंजाब कला परिषद की ओर से सेक्टर-16 के पंजाब कला भवन में बुधवार को बंदनवार कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इसके तहत कविशरी हुई, जिसमें चार टीमों ने हिस्सा लिया। सबसे पहले स्टूडेंट्स की राजविंदर कौर, सतपाल कौर, रवनीत और सुमन ने कविशरी गाई। इसके बाद गगनजीत सिंह, सुखरेज सिंह, गुरदीप सिंह ने कविशरी पेश की। कार्यक्रम की प्रधानगी अकादमी की प्रधान डॉ.सरबजीत कौर सोहल ने की। मंच का संचालन डॉ.कुलदीप सिंह दीप ने किया। यह सब टीम पटियाला, पंजोली कला, मानसा, बठिंडा, बोहा से थी।

Bandanwar

पंजाब साहित्य अकादमी और पंजाब कला परिषद की ओर से सेक्टर-16 के पंजाब कला भवन में बुधवार को बंदनवार हुआ। जिसके तहत कविशरी का आयोजन किया गया।

यह है कविशरी|डॉ. कुलदीप सिंह दीप पंजाब साहित्य अकादमी के मेंबर है। साथ ही कार्यक्रम के आयोजक भी। उन्होंने बताया कि कविशरी...पंजाब का पारंपरिक काव्य है (छंदबद्ध कविता का गेय रूप है)। जिसे कविशर बिना साज के सिर्फ गायन कला के जरिए पेश करता है। कविशरी के लिए पंजाबी व पंजाब की कई उपभाषा का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसका गढ़ मलवाई को माना जाता है। इसमें सामाजिक घटना, इतिहास, किस्से, कहानियों को कविताओं, छंद का रूप दिया जाता है। खुशी के मौकों पर इसे सुनाया जाता है। कविशरी की परंपरा कम न हो इसलिए इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया है, ताकि सबका रुझान इस तरफ बढ़े।

स्कूल में सीखी यह कविशरी कला

राजविंदर कौर ने अपनी दो साथी लक्ष्मी और जसप्रीत के साथ मिलकर कविशरी पेश की। यह तीनों पंजोली कला से है और नौंवी कक्षा में पढ़ते हैं। बताते हैं- इस गाते दो साल हो गए हैं। जब भी मौका मिलता है हम कविशरी पेश करते हैं। स्कूल में ही हमें यह कला सीखने को मिली। हमें अच्छा लगता है कि हम इसका हिस्सा हैं।

परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं

गगनजीत सिंह, जसप्रीत और निंदरजीत सिंह पटियाला से हैं। तीनों कॉलेज में पढ़ते हैं और पांच साल से कविशरी पेश कर रहे हैं। बताते हैं- संगीत और साहित्य से जुड़े होने के साथ हम अपनी सभ्यता से भी जुड़े हैं। तभी कविशरी की परंपरा को हम आगे ले कर जा रहे हैं। खुशी का मौका, मेले, अखाड़ों और कंपीटिशन में हम इसे पेश करते हैं।

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