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प्रोफेसर गौतम...जो फिलॉसफर ही नहीं दोस्त भी थे

वे पिछले दिनों चंडीगढ़ आए तो जाते हुए बोले-अभी तो मैं अपने आर्टिस्ट दोस्त मलकीत सिंह से मिलने जा रहा हूं। उसकी तबीयत...

Dainik Bhaskar

Feb 01, 2018, 02:10 AM IST
वे पिछले दिनों चंडीगढ़ आए तो जाते हुए बोले-अभी तो मैं अपने आर्टिस्ट दोस्त मलकीत सिंह से मिलने जा रहा हूं। उसकी तबीयत ठीक नहीं है। अगली बार आप सबसे मिलता हूूं लंबी बातें करनी हैं। उनका ये जाना हमेशा के लिए जाना बन गया। प्रोफेसर सत्यपाल गौतम का मृत शरीर बुधवार सुबह जेएनयू के पास स्थित उनके घर से मिला। वे वहां अकेले रहते थे। उनके मित्र दीवान माना ने बताया-उनके मकान मालिक ने घर का दरवाजा न खुलने पर उनके किसी परिचित को फोन किया तब जाकर पता चला कि वे जीवित नहीं हैं। इसके बाद उनकी बहन को पंजाब में इसकी सूचना दी गई। इससे पहले 20 जनवरी को ही उनके दोस्त और शहर के जाने-माने आर्टिस्ट मलकीत सिंह ने भी इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। प्रोफेसर गौतम पंजाब यूनिवर्सिटी के फिलॉसफी डिपार्टमेंट में पढ़ाते थे और सीनेट से लेकर सिंडीकेट तक में बने रहे। बाद में वे जेएनयू चले गए और फिलॉसफी डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी संभाली। इसी बीच उनकी नियुक्ति बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी बरेली में वाइसचांसलर पद पर हो गई। वहां काम करने के बाद वे जेएनयू लौटे। प्रोफेसर गौतम उन लोगों में से थे जो सबके दोस्त हो सकते हैं। पीयू में रहते हुए वे सिर्फ अपने साथ काम करने वालों के दोस्त नहीं थे। उनके पास पत्रकारों का भी जमावड़ा रहता। कुछ के लिए तो वे पीयू का एन्साइक्लोपीडिया थे। पीयू के बारे में जितनी जानकारी उनके पास थी संभवत: उनके समय के किसी और प्रोफेसर के पास नहीं रही। वे आजीवन अकेले रहे। उन्होंने अपनी एक पोस्ट में एक बार लिखा-

आई एम एवर हैप्पी इन माय सॉलिट्यूड बट नेवर हैप्पी इन माय लोनलीनेस।

उनका जाना महज एक शिक्षक का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसे दोस्त का जाना भी है जो शिक्षा को सिलेबस से बाहर जीवन में जाकर पढ़ाने अौर समझाने की क्षमता रखते थे।

अलविदा प्राेफेसर गौतम...आप सचमुच सबको बहुत याद आएंगे ।

Tribute

पंजाब यूिनवर्सिटी के फिलॉसफी डिपार्टमेंट से जेएनयू पहुंचे प्रोफेसर सत्यपाल गौतम का दिल्ली में निधन हो गया ...वे 67 वर्ष के थे ।

26 अक्टूबर 1951 -31 जनवरी 2018

जानता हूं मरने पर लोग बहुत याद करेंगे

प्रोफेसर गौतम दुनिया के कई देशों में अपनी शैक्षिक गतिविधियों के सिलसिले में जाते रहते थे। उन्हें ये यात्राएं करना भाता था। वे कहते थे कि यात्राएं आपको जीवन का नया नजरिया देती हैं। वे अपने जीवन में यूनिवर्सिटी से जुड़्ी अनेक कमेटियों के हिस्सा बने रहे। अक्सर चंडीगढ़ किसी न किसी मीटिंग को अटेंड करने या फिर कोई लेक्चर देने आया करते थे। कहते थे-मैं चंडीगढ़ आने का बहाना ढूंढता हूं। यहां से जाने के बाद भी मैं यहां से जा नहीं सका। मैंने दुनिया भर मंे इतनी जगह खुद को जोड़ा है कि लोग मेरे जाने के बाद हर जगह याद करेंगे। जितनी जगह मैंने काम किया है वे लोग, जितने लोगों को मैंने पढ़ाया है वे लोग और वे सब जिनके साथ मैं किसी न किसी कमेटी में हूं, वे लोग ...कितना कुछ है ऐसा इन सबको मेरी याद दिलाएगा।

प्रोफेसर गौतम जालंधर से थे। वहीं दोआबा कॉलेज में उन्होंने शिक्षा ग्रहण की और बाद में पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ आ गए।

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