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हिमाचल से कारीगर बुलाकर राष्ट्रपति ने बनवाई टोपी, फिर पहने कर ली गणतंत्र दिवस समारोह में सलामी

हिमाचल से कारीगर बुलाकर राष्ट्रपति ने बनवाई टोपी, फिर पहने कर ली गणतंत्र दिवस समारोह में सलामी

suraj thakur | Last Modified - Jan 29, 2018, 10:55 AM IST

सोलन।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे पर पहने हुई हिमाचली टोपी व मफलर तो सबने देखा। वो टोपी और मफलर सोलन में तैयार हुआ था। अब एक बार फिर सोलन में ही बनी हुई हिमाचली टोपी गणतंत्र दिवस के मौके पर राजपथ पर राष्ट्रपति रामनाथ कोबिंद के सिर की शान बनी। पढ़ें पूरी खबर...

शुक्रवार को जब राष्ट्रपति रामनाथ कोबिंद 69 वें गणतंत्र दिवस समारोह के मौके पर सलामी ले रहे थे, तो दुनिया भर के लोगों ने राष्ट्रपति के सिर पर एक बार फिर हिमाचली टोपी देखी। इत्तेफाक ये है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के सिर पर सजी हिमाचली टोपी सोलन के एक ही कारीगर ने बनाई है। इस हिमाचली टोपी को सोलन के मशहूर कारीगर संगत सिंह पुंडीर ने तैयार किया था।

इजरायल पहुंचे मफलर-टोपी...

संगत सिंह पुंडीर ने बताया कि विस चुनाव से पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिमला आए थे तो भाजपा प्रदेश महामंत्री ठाकुर चंद्रमोहन प्रधानमंत्री के लिए मफलर और टोपी ले गए थे। उस समय जो प्रधानमंत्री को मफलर दिए गए थे। शिमला में मोदी को दी गई टोपी और मफलर को प्रधानमंत्री ने अपने अमेरिका व इजराइल दौरे के दौरान पहना था।

कैसे पहुंचे राष्ट्रपति भवन तक संगत पुंडीर...


संगत सिंह पुंडीर ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि राष्ट्रपति को हिमाचली टोपी से विशेष लगाव है। सांसद वीरेंद्र कश्यप ने राष्ट्रपति के लिए हिमाचली टोपी ली थी, लेकिन वो उस टोपी की गहराई थोड़ी कम करवाना चाहते थे। एक रोज वीरेंद्र कश्यप के माध्यम से ही उन्हें राष्ट्रपति भवन से बुलावा आया।

20 जनवरी 2018 को संगत सिंह पुंडीर, अपने बेटे अभिनव पुंडीर व सांसद वीरेंद्र कश्यप के साथ दिल्ली राष्ट्रपति भवन पहुंचे। इस दौरान राष्ट्रपति ने हिमाचली टोपी को लेकर बताया कि कि उन्हें कैसी टोपी पसंद है। 21 जनवरी को दिल्ली से सोलन आकर राष्ट्रपति की पसंद के मुताबिक चार टोपियां बनाई। ये टोपियां 22 जनवरी को सांसद वीरेंद्र कश्यप को दे दीं गईं। गणतंत्र दिवस समारोह में राष्ट्रपति के सिर पर अपनी बनी टोपी देखी तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

फायरमैन से ऐसे बने टोपी का कारीगर...


सिरमौर के भुजौंड गांव के रहने वाले संगत सिंह पुंडीर के कुल्लवी अौर किन्नौरी टोपी बनाने में महारत हासिल करने के पीछे की कहानी भी रोचक है। पुंडीर फायर ब्रिगेड विभाग में फायरमैन थे। 1990 में उनका तबादला नाहन से कुल्लू हो गया। उन्हें पेटिंग का शौक था और कुछ नया करना चाहते थे। कुल्लू तबादला होने के बाद नौकरी के साथ खाली वक्त में डूग्लेराम ठाकुर से टोपी, मफलर व शॉल बनाना सीखना शुरू किया। 1992 में उन्होंने कुल्लू में टोपी, शॉल व मफलर बनाने के लिए सैटअप तैयार करके पार्ट टाइम काम शुरू कर दिया। 2002 में पुंडीर का तबादला सोलन हो गया। सोलन आकर भी वैसा ही सैटअप तैयार किया और काम में जुटे रहे। जब टोपियां, मफलर और शॉल बनाने का काम अच्छा चल पड़ा तो पुंडीर ने फायरब्रिगेड से प्रीमैच्योर रिटायरमेंट ले ली और पूरा ध्यान धंधे पर लगा दिया।

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