सोलो ट्रेवलिंग से कॉन्फिडेंस तो बढ़ा ही, देश को भी जाना

Chandigarh News - जब मन में कुछ करने की जिद हो तो अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए इंसान हर रूकावट से लड़ पड़ता है। ऐसी ही हैं सिटी बेस्ड...

Bhaskar News Network

Jun 14, 2019, 07:25 AM IST
Chandigarh News - confidence also increased by solo travel the country also needs to go
जब मन में कुछ करने की जिद हो तो अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए इंसान हर रूकावट से लड़ पड़ता है। ऐसी ही हैं सिटी बेस्ड सोलो ट्रेवलर शिवांगी शर्मा। ट्रेवलिंग के जरिए देश की ब्यूटी को एक्सप्लोर कर रही हैं। बताती हैं- लगभग पूरा इंडिया घूम चुकी हूं। इंडिया के अलावा ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड में भी सोलो ट्रेवलिंग कर चुकी हूं। मेरा पहला सोलो ट्रेवल इंग्लैंड का था। अब भी मैं अपने दोस्त सार्थक आहुजा के साथ के साथ बोमडिला अरुणाचल प्रदेश में ट्रेवल ट्रिप पर हूं। इस ट्रिप में हमने 7 स्टेट असम, अरुणाचल प्रदेश, मनीपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अगरतला, मेघालय अौर नागालैंड को कवर करना है। इसके जरिए हम सस्टेनेबल टूरिज्म को प्रमोट कर रहे हैं। इसके जरिए हम 30 दिनों में अलग-अलग जगहों के एन्वायर्नमेंट व कल्चर के इम्पैक्ट की कहानियों को एक्सप्लोर करेंगे। ट्रेवलिंग के बारे में बोलीं- मैंने 26 साल की उम्र में गाड़ी चलानी सीख ली थी। उसके बाद कहीं भी जाती हूं तो गाड़ी मेरे साथ होती है। अकसर लोग यही सोचते हैं कि लड़कियों को गाड़ी चलानी नहीं आती। पर मैं यही कहूंगी कि मैं पूरा इंडिया खुद गाड़ी चलाकर घूम चुकी हूं। फैमिली के सपोर्ट को लेकर बोलीं- पापा बिजनेसमैन हैं आैर मां हाउसवाइफ। मम्मी पापा नहीं चाहते थे कि मैं सोलो ट्रेवलिंग करूं, क्योंकि उन्हें मेरी सेफ्टी की चिंता थी, पर मैं जो एक बार जो ठान लेती हूं तो पीछे नहीं हटती। मैंने पापा को मनाया और गाड़ी लेकर निकल पड़ी। सेफ्टी काे लेकर बोलीं- देश हो या विदेश सोलो ट्रेवलिंग में बेसिक प्रीकॉशन तो रखनी ही पड़ती हैं जैसे लेट नाइट पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर नहीं करना आदि चीजें। इन सब चीजों का ध्यान रखेंगे तो कोई प्रॉब्लम नहीं आती। बल्कि आप जहां भी जाते हैं वहां के लोग आपका मान सम्मान करते हैं। ट्रेवलिंग के दौरान ही पता चला कि भारत भी सेफ कंट्री है।

सिटी बेस्ड सोलो ट्रेवलर शिवांगी शर्मा और सार्थक ने हमसे साझा किए अपने ट्रेवलिंग के अनुभव ।

ट्रेवलिंग से मैं एंग्जाइटी से उबरा

सार्थक दिल्ली यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन फ़र्स्ट ईयर के स्टूडेंट हैं। उन्होंने बताया- वैसे तो मुझे फोटोग्राफी का शौक है, पर ये शौक भी ट्रेवलिंग से जुड़ा है। पहला ट्रिप मेरा जर्मनी का था जो स्कूल की ओर से गया था। इंडो-जर्मन कल्चर एक्सचेंज प्रोगाम के तहत स्टूडेंट्स को जर्मनी भेजा गया था। उसके बाद तो मुझमें जैसे ट्रेवलिंग का भूत सवार हो गया। 12वीं की छुट्टियों में मैंने कैंपेनिंग ट्रिप सर्च किए। उसमें माउंटेनिंग के बारे में पता चला। पापा को बोला तो उन्होंने जाने के लिए साफ मना कर दिया। मैं घर से भाग गया। बस में बैठकर देखा कि किराए के लिए तो पैसे है ही नहीं। तब पापा पीछे आए और उन्होंने मुझे पैसे दिए। इस ट्रिप में हमने उत्तराखंड से हिमाचल ट्रेकिंग के जरिए जाना था। इस दौरान में एक बार गिर भी गया था, लेकिन मेरा हौसला नहीं ठगमगाया। उसके बाद ही ट्रेवलिंग का सिलसिला शुरू हो गया। ट्रेवलिंग से मैं एंग्जाइटी से उबरा हूं। मुझमें कॉन्फिडेंस बढ़ा है।

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