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मैं खुद को बेच नहीं सकता, तो राजनीति में आने का सवाल ही नहीं

आरती एम अग्निहोत्री | चंडीगढ़ हिंदी फिल्मों में एक्टर रजा मुराद का रुतबा तो बेहतर है ही, इनकी आवाज में भी एक अलग-सा...

Dainik Bhaskar

May 02, 2018, 02:00 AM IST
मैं खुद को बेच नहीं सकता, तो राजनीति में आने का सवाल ही नहीं
आरती एम अग्निहोत्री | चंडीगढ़

हिंदी फिल्मों में एक्टर रजा मुराद का रुतबा तो बेहतर है ही, इनकी आवाज में भी एक अलग-सा ही दम है। वे जब भी बोलते हैं, तब पिन ड्रॉप सायलेंस होता है। उन्हें सभी ध्यान से सुनते हैं। आपकी बात का इतना रौब है जो सभी पर असर करती है और आपको सभी पसंद भी करते हैं। क्या आपने कभी राजनीति में जाने की नहीं सोची? इसपर रजा मुराद बोले - मैं खुद को बेच नहीं सकता। अपने जमीर की आवाज को नहीं दबा सकता। इसलिए राजनीति में आने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

वे 300 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके हैं। इतनी फिल्मों में काम करने के बाद रजा मुराद अपने अनुभव शेयर करते हुए बोले कि पहले के समय में फिल्में पूरी प्लानिंग से बनती थीं। जब पूरी फिल्म का माई बाप हीरो होता था। वही फैसला करता था कि फिल्म का डायरेक्टर कौन होगा, कौन गीत गाएगा आदि। पर उस जमाने में लोग अनुशासन में नहीं होते थे। अगर हीरो देरी से भी आता था तो कोई सवाल नहीं पूछता था। मैं न हीरो और न ही फिल्म का नाम लूंगा पर किस्सा जरूर सुनाऊंगा। हुआ यूं कि रेस कोर्स में 20 घोड़े किराए पर लिए, भीड़ इकट्ठा की। लाखों रुपए खर्च हुए और दो दिन तक हीरो नहीं आया। तीसरे दिन जब हीरो आया तो रेस कोर्स वाले ने कोर्स देने से मना कर दिया। हमने गोल्फ कोर्स में वो रेस कोर्स तैयार किया। पहले फिल्में दिल से बनती थीं, आज दिमाग से बनती हैं। पर, हां आज लोग समय के पक्के हो गए हैं, प्रोफेशनल हो गए हैं और फिल्में हाईटेक बनने लगी हैं। म्युजिक की बात करूं तो गानों में सिर्फ म्युजिक की सुनता है। लिरिक्स होते ही नहीं। सुनकर बता ही नहीं सकते कि गाना गाया किसने है। जबकि पहले के समय में बहरा भी बता देता था कि ये गाना किसने गाया है। यही वजह है कि पहले जो फिल्में हिट रही हैं, चाहे शोेले हो या मुगलेआजम। किसी के सीक्वेल नहीं बने।

एक फेस्टिवल में शिरकत करने पहुंचे एक्टर रजा मुराद ने राजनीति में जाने के कयास और फिल्मों के अनुभवों को शेयर किया...

राम तेरी गंगा मैली को लेकर इमोशनल अौर सेंटीमेंटल हूं

आपकी कई फिल्में हिट रही हैं। ऐसे में अापकी अब तक की पसंदीदा फिल्म कौन-सी है? इसपर रजा बोले- मैं अपनी फिल्म राम तेरी गंगा मैली को लेकर काफी इमोशनल अौर सेंटीमेंटल हूं। ये राज कूपर साहेब की भी आखिरी फिल्म थी। इस फिल्म के बाद मुझे कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। सुभाष घई, जेपी दत्ता, राकेश रोशन, राकेश सिप्पी सहित कई निर्माता-निर्देशकों ने मुझे संजीदगी से फिल्मों में लेना शुरू किया।

एक्टिंग भी अलग-अलग लेवल पर होती है

रजा मुराद बोले- कि आज तक मैंने जितनी फिल्मों में भी काम किया, वो अब मेरे काम आ रहा है। मैं स्कूल, कॉलेजों में कार्यक्रमों में जाता हूं। सेमिनार लेता हूं। बच्चों को एक्टिंग की कोचिंग देता हूं। अपने 48 साल का अनुभव साझा करता हूं। मैं यही कहता हूं कि देश की 125 करोड़ आबादी से 125 ही टॉप के एक्टर्स का नाम ले दो। तो सब चुप हो जाते हैं। फिर मैं कहता हूं कि आप खुद देख लो एक करोड़ आबादी के पीछे एक को एक्टर भी नहीं कह सकते। इसलिए एक्टिंग को इतना आसान न समझें। जिस तरह क्रिकेट को अलग-अलग लेवल पर खेला जाता है, ठीक उसी तरह एक्टिंग भी अलग-अलग लेवल पर होती है।

हमदर्द दोस्तों की तरह रही हैं पंजाबी फिल्में

रजा को पंजाबी फिल्मों में काम करने के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी मिल चुका है। बोले- जिस तरह हमदर्द दोस्त बुरे वक्त में काम आते हैं, ठीक उसी तरह पंजाबी फिल्में मेेरे काम आई हैं। जब मेरे पास कोई काम या नौकरी नहीं थी, तब मुझे पंजाबी फिल्मों ने मेरा दामन थामा और मेरी रसोई चली।

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