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इस क्लीनिक में बिगड़ते हेरिटेज का ट्रीटमेंट किया जाता है

आरती एम अग्निहोत्री | चंडीगढ़ सिखों के छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी जिस चोले को पहनकर जहांगीर की मौजूदगी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 10, 2018, 02:00 AM IST

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    आरती एम अग्निहोत्री | चंडीगढ़

    सिखों के छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी जिस चोले को पहनकर जहांगीर की मौजूदगी में 52 राजाओं को छुड़ाकर लाए थे। वह 400 साल पुराना सिल्क का चोला लुधियाना के पास गांव घुढानी कलां के एक गुरुद्वारे में था। उसपर फंगस लग गई थी और तीन-चार जगह से उधड़ा सा था। 5 दिन तक इसका ट्रीटमेंट हुआ और अब ये उसी गुरुद्वारे में एसिड फ्री फोमकोर बोर्ड में रखा गया है। यहां वेंटिलेशन न होने की वजह से अब इस बोर्ड में थोड़ा उमस आ गया है तो सिटी बेस्ड नमिता जसपाल इसके बोर्ड को बदलने की सोच रही हैं। वो इसलिए क्योंकि नमिता की इससे बड़ी यादें जुड़ी हैं। उन्होंने 2011 में लगातार 15 दिन हर रोज इस गुरुद्वारे में जाकर इसका ट्रीटमेंट किया था। नमिता हेरिटेज प्रिजर्वेशन आटिलियर की निदेशक हैं। उन्होंने नेशनल म्यूजियम दिल्ली से कंजर्वेशन ऑफ कल्चरल प्रॉपर्टी में मास्टर्स की है। इस वक्त वह मॉन्यूमेंट्स और कलेक्शंस सहित हेरिटेज प्रॉपर्टी की कंजर्वेशन कंसल्टेंसी कर रही हैं। बताती हैं- हेरिटेज को कंजर्व करने की टेक्नीक साइंस और आर्ट का मिक्स है। इसे प्रैक्टिस करने वाले को फिजिकल लॉ, कैमिकल, ऐस्थेटिक सेंस, आर्टिस्टिक हैंड और आर्ट की समझ होना जरूरी है। वह इस दिशा में साल 2006 से काम कर रही हैं। नमिता कहती हैं- मैंने ग्रेजुएशन में बीएससी की पढ़ाई की। साइंस की स्टूडेंट होने के नाते हमेशा यही सोचती थी कि पुरानी चीजों को संभालने की जरूरत क्या है, नई बनाओ। पर पढ़ाई करने के बाद समझ आया कि ये सब तो मानव सभ्यता की यादगार चीजें हैं। इन्हें संभालना बेहद जरूरी है। इन चीजों को कंजर्व करते हुए मुझे एहसास हुअा कि पुराने समय में लोग कितनी बारीकी से काम करते थे। उनकी तकनीकें भी सही होती थीं। इन्हें देखकर लगता है कि कहीं हम पिछड़ तो नहीं रहे।

    सिटी बेस्ड नमिता जसपाल मॉन्यूमेंट्स और कलेक्शंस सहित हेरिटेज प्रॉपर्टी की कंजर्वेशन कंसल्टेंसी और ट्रीटमेंट कर रही हैं। इसी पर हमने उनसे बात की।

    अब तक इन सब पर काम कर चुकी हैं

    श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का 400 साल पुराना सिल्क का चोला यह है।

    इन्हें किया जाता है कंजर्व और प्रिजर्व

    अमृतसर गोल्डन टेंपल स्थित श्री हरमंदर साहिब की वॉल पेंटिंग्स की कंजर्वेशन। अपने एथिकल ट्रीटमेंट देने के लिए नमिता को इसके लिए काफी सराहना मिली। श्री हरमंदर साहिब के इतिहास में पहली बार 2013 दिसंबर से 2016 तक प्रोफेशनल टीम ने साइंटिफिक तरीके से वॉल पेंटिंग्स की कंजर्वेशन और प्रिजर्वेशन की।

    नेशनल रेल म्यूजियम दिल्ली में रखी पटियाला मोनोरेल का कोच अंदर से बिलकुल टूट गया था। इसकी रिपेयर 2012 में की। बाद में इस कोच को फिल्म का और की में इस्तेमाल किया गया था।

    चंडीमंदिर स्थित 200 साल पुराना सिल्क का 9 फुट लंबा झंडा दूसरे डोगरा रेजिमेंट का बेशकीमती स्मृति चिन्ह था। जो बेहद खराब स्थिति में था। इसे इन्होंने ट्रीट किया।

    स्टेटिक बिल्डिंग्स, पेंटिंग्स, पेपर, फोटोग्राफ्स, टेक्सटाइल, सिरेमिक्स, स्टोन, मेटल, हाथ से लिखी मैनुस्क्रिप्ट्स, आर्किलोजिकल ऑब्जेक्ट्स, प्रिंट्स, पेंटिंग्स अादि।

    18वीं सदी के पोस्टर को प्रिजर्व करती नमिता।

    ऐसे करती हैं ट्रीटमेंट

    सबसे पहले कंजर्व या प्रिजर्व करने वाली वस्तु की स्थिति का ऐतिहासिक और साइंटिफिक एनालेसिस होता है। कि यह किस पीरियड का या फिर इसकी कैमिकल कंपोजीशन क्या हैं।

    डैमेज और कंडीशन का खाका तैयार किया जाता है। ताकि तय किया जा सके कि इसका ट्रीटमेंट क्या हो।

    फिर टेस्टिंग एनालाइज होता है। इसमें कोमल कैमिकल्स के साथ ट्रीटमेंट शुरू होता है और जरूरत लगे तभी कैमिकल बदले जाते हैं।

    आखिर में फाइनल ट्रीटमेंट होता है। जहां ट्रीट किए जा रही चीज को आिखरी स्टेज पर पहुंचा कर उसे ऐसी जगह रखने को कहा जाता है जहां आगे उसे कोई नुकसान न हो।

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