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सुरिंदर कौर की आवाज अब उनकी बेटी और नातिन के गले से निकलती है

सुरिंदर कौर की आवाज अब उनकी बेटी और नातिन के गले से निकलती है आरती एम अग्निहोत्री | चंडीगढ़ मेरी मां बेहद नर्म...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 15, 2018, 02:00 AM IST

सुरिंदर कौर की आवाज अब उनकी बेटी और नातिन के गले से निकलती है
सुरिंदर कौर की आवाज अब उनकी बेटी और नातिन के गले से निकलती है

आरती एम अग्निहोत्री | चंडीगढ़

मेरी मां बेहद नर्म दिल व खूबसूरत थीं। उन्होंने जिंदगी में कभी किसी से कुछ नहीं लिया बल्कि हमेशा दिया ही था। मुझे तो संगीत का ऐसा वरदान दे गईं कि मैं आज तक उन्हीं के गीत गा रही हूं। उनके गीतों को कभी मरने नहीं दूंगी। इतना ही नहीं मेरी बेटी, मेरी नातिन सब मां के गीत ही गाती हैं। कहीं जाकर कुछ नया सुनाने की कोशिश करती हूं तो लोग नहीं सुनते। वो सिर्फ मां के ही गीत सुनना चाहते हैं। अपनी मां और नाइटेंगल ऑफ पंजाब सुरिंदर कौर की 12वीं पुण्यतिथि पर कुछ ऐसे बोलीं पंजाब की फोक सिंगर डॉली गुलेरिया। डॉली बोलीं- पंजाब की संस्कृति में मां ने अपना ऐसा रुतबा बनाया कि लड़की की शादी हो तो मधाणीयां, मांवां ते तियां दी दोस्ती और लड़के की शादी हो तो मत्थे ते चमकण वाल मेरे बनड़े दे गीत गाए ही जाते हैं। सिर्फ पंजाब ही नहीं, लखनऊ और कोलकाता जैसे शहरों में भी लोग इन्हीं गीतों को सुनते हैं। यंगस्टर्स जो बदले ट्रेंड की बात करते हैं, रैप की बात करते हैं, वो भी मां के गीत रीमिक्स करके गाते हैं। फिल्मी गीतों में मां के गीत लॉन्ग ग्वाचा , काले रंग दा परांदा आदि का एक-एक वाक्य ही सही, पर इस्तेमाल जरूर करते हैं।

अपनी मां और नाइटिंगेल ऑफ पंजाब पद्मश्री सुरिंदर कौर की 12वीं पुण्यतिथि पर पुरानी यादें साझा कीं डॉली गुलेरिया ने।

पद्मश्री सम्मान को सेलिब्रेट करने गई थीं अमरीका, फिर नहीं आईं

डॉली ने कहा- मां को मार्च 2006 में पद्मश्री से नवाजा गया। इसी के जश्न के लिए मेरी दोनों बहनों ने मां को न्यू जर्सी बुलाया था। मां तीन मई को वहां पहुंचीं, छोटी बहन के घर एक दिन रहीं। हवाई जहाज में एसी से ठंड लगने के कारण उन्हें निमोनिया हो गया। चार मई को उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया और 40 दिन बाद अस्पताल में ही उन्होंने वहां की 14 जून की रात और यहां की 15 जून की सुबह को अस्पताल मेंं आखिरी सांस ली। उस वक्त उनकी उम्र 76 साल थी। वह कभी वापस नहीं आईं हालांकि हमने उन्हें जाने से रोका भी था।

अभी तक कोई नहीं ले पाया वैसा मुकाम

14 साल की उम्र में मां ने प्रोफेशनल सिंगिंग शुरू की। 1948 से 1953 तक मुंबई में रहकर 35 फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग की। मां पूरी दुनिया में गाकर आईं। उन्हें पद्मश्री, नाइटिंगेल आॅफ पंजाब से नवाजा गया। गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्ट्रेट की डिग्री दी। मां की कितनी एलबम आईं, इसका अंदाजा मुझे नहीं। पर मेरे पास उनकी जो डायरी है, उसमें दो से ढाई हजार गीत हैं। इतने ही गीत उन्होंने गाए। पंजाबी फोक म्यूजिक में उन्होंने जो मुकाम पाया, उसे आज तक कोई हासिल नहीं कर पाया।

पंजाब में घर की तमन्ना रह गई अधूरी|उन्होंनेकहा- मेरी मां अपनी जिंदगी के 50 साल दिल्ली में रहीं। उनकी ख्वाहिश थी कि वह पंजाब आकर रहें, यहां उनका अपना घर हो। पंजाब से कई लोगों ने कहा कि आप नाइटिंगेल ऑफ पंजाब हैं, आपको पंजाब लेकर जाएंगे। पर किसी ने इस दिशा में कुछ किया नहीं। दिल्ली में मॉल रोड पर जहां हमारा घर था, वहां मेट्रो ट्रेन का प्रोजेक्ट शुरू हुआ। उसी रास्ते में हमारा घर भी आता था। जब वहां खुदाई या ड्रिलिंग होती तो पूरा घर कांपता और मां घबराने लगती। आखिरकार हम उस घर को बेचकर मां को पंचकूला ले आए। यहां वह किराए के मकान में रहने लगीं। हमने जीरकपुर स्थित सिल्वर सिटी में मां के लिए घर बनाना शुरू किया। घर पूरा बना भी नहीं था और मां चल बसीं। इसके बाद हमारा मूड इतना ऑफ हुआ कि हमने उस घर को बेच दिया।

हिंदुस्तान का हर बेटा उनका था|डॉलीबोलीं- मां हर किसी को बेटा बना लेती थी। हम बहनों को अजीब लगा तो हमने मां से कहा कि लगता है तुम्हारी बेटे की तमन्ना अधूरी रह गई है। हमारा ध्यान नहीं है तुम्हें? इस पर मां ने हमें गले से लगाते हुए कहा कि मेरी कोख से भले ही किसी बेटे ने जन्म नहीं लिया। पर हिंदुस्तान का हर बेटा मेरा बेटा है। मेरी मां भी मेहमानवाजी इतनी अच्छी थी कि वह किसी को भी घर से बिना खिलाए नहीं भेजतीं। यहां तक कि हमारे पोते-पोती नाति-नातिन जब भी जाते, वह कुछ न कुछ गिफ्ट या पैसे देकर ही भेजतीं।

जगमोहन सांगा ने सुरिंदर कौर के लिए लिखा था ये गीत-

हाय नी अमड़िए, घुप हनेरा कोई राह न दिखे, तैनूं कित्थों मोड़ ले आइए।

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