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नाटक में अफगानी शासन में लेकर गए बीरबल की कहानी से

अकबर और बीरबल के किस्सों से सभी वाकिफ हैं। इनके कारनामों के बारे में इतिहास की किताबों में पढ़ा भी होगा। पर शायद...

Danik Bhaskar | Jun 15, 2018, 02:00 AM IST
अकबर और बीरबल के किस्सों से सभी वाकिफ हैं। इनके कारनामों के बारे में इतिहास की किताबों में पढ़ा भी होगा। पर शायद आपने किसी दूसरे बीरबल के बारे में सुना होगा जो 18वीं सदी में हुए। यह नाम था बीरबल दर का। उन्होंने अफगानी सल्तनत के खिलाफ आवाज बुलंद की। मगर इनके बारे में न ही कोई बात करता है न ही जानता है। इतिहास के इन्हीं पन्नों में लेकर जाया गया टैगोर थिएटर में तीन दिवसीय जम्मू एंड कश्मीर थिएटर फेस्ट के जरिए। वीरवार शाम इस फेस्ट का दूसरा दिन था। इसमें हिंदी नाटक एक और बीरबल खेला गया। इसका लेखन राकेश रोशन भट्‌ट ने किया। डायरेक्शन रोहित भट्‌ट की रही। यह पेशकश जम्मू के बोमेध रंगमंच ग्रुप के 20 कलाकारों की थी। बीरबल के जरिए कश्मीरी पंडित की कहानी को बताना चाहा। यह रियलिस्टिक कहानी थी, जो बीरबल दर और पंडित मिर्जा काक नामक दो किरदारों पर आधारित रही। कहानी वॉयस ओवर के एक छोटे से नरेशन से शुरू होती है। इसमें अफगानी शासनकाल को दर्शाया गया। जब अजीम खां की सल्तनत थी। उन्होंने देखा कि अजीम खां के अत्याचार बढ़ रहे हैं। यह देखकर बीरबल दर लाहौर जाकर महाराजा रंजीत सिंह से मदद मांगने का फैसला करता है। इतने में अजीम खां के जुल्मों से परेशान होकर बीरबल की प|ी जहर खा लेती है। इसके बाद वह अपनी बहू को अफगानिस्तान लेकर जाते हैं। वह महाराजा को मनाकर कश्मीर लाते हैं। उनकी मदद से अफगानी शासन को खत्म कराते हैं।

टैगोर थिएटर में चल रहे फेस्ट के दूसरे दिन नाटक एक और बीरबल खेला गया।