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किसानों को खेती करने में मदद करेगा तीन दोस्तों का यह आइडिया

Dainik Bhaskar

Jun 15, 2018, 02:00 AM IST

News - जिस किसान के पास एक एकड़ से भी कम जमीन होती है, उसके लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के फार्म इक्विपमेंट को अफोर्ड करना काफी...

किसानों को खेती करने में मदद 
 करेगा तीन दोस्तों का यह आइडिया
जिस किसान के पास एक एकड़ से भी कम जमीन होती है, उसके लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के फार्म इक्विपमेंट को अफोर्ड करना काफी मुश्किल होता है। ऐसे ही किसानों के लिए हल निकाला है- फार्मार्ट एग्रिटेक ने। इसे सिटी बेस्ड मेहताब सिंह हंस ने अपने दोस्तों अलेख संघेड़ा और लोकेश सिंह के साथ मिलकर स्थापित किया है। इसका ऑप्रेशन चंडीगढ़ और लखनऊ से होता है। इसके अंतर्गत बड़े किसानों से ट्रैक्टर और मशीनरी लेकर छोटे किसानों को किराए पर दी जाती हैं। बदले में ये किसान कुछ पैसा दे देते हैं। यह बिजनेस मॉडल किसानों के लिए काम करता है। यहां किसानों के पास न ट्रैक्टर हैं न मशीनरी। पर जरूरत पड़ने पर उन्हें ये सब मुहैय्या करा दिया जाता है। फार्मार्ट 40 साल की उम्र से ऊपर के किसानों को केटर करता है। अपने ऑर्डर देने के लिए ये किसान मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं।

मेहताब ने बताया- हम दो चीजों को ध्यान में रखकर काम करते हैं। किसी विशेष क्षेत्र में कितने छोटे किसान हैं और उसी क्षेत्र में कितनी मशीनरी और ट्रैक्टर हैं। ऑर्डर आने पर हम उस क्षेत्र के करीब मशीनरी ओनर को लोकेट करते हैं। इसके बाद हम उचित मोलभाव कर उसे किसान के पास भेज देते हैं। ट्रैक्टर के साथ ड्राइवर और मशीनरी के साथ ऑपरेटर को भेजा जाता है। एक एकड़ को तैयार करने के लिए ईंधन और ड्राइवर के खर्च के लिए एक हजार से दो हजार रुपए दिए जाते हैं। इंटरनेट ऑफ थिंग्स डिवाइस के जरिए हम इक्विपमेंट और उसके द्वारा हुए काम को लोकेट करते हैं।

मेहताब ने बताया- मशीनरी ओनर्स एक दिन में पांच से सात हजार रुपए कमाते हैं और हम इनसे 10 से 12 प्रतिशत कमीशन लेते हैं।

यूपी को कर रहे केटर| मेहताब ने बताया- अभी ये यूपी में केटर कर रहे हैं क्योंकि तमिलनाडु, पंजाब और हरियाणा में तो लोगों के पास ये सुविधाएं हैं। दो साल में यूपी में इनके पांच हजार से ज्यादा कस्टमर और 300 मशीनरी ओनर जुड़ चुके हैं। अब हम मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तराखंड में इसे ऑपरेशनल करेंगे।

दो साल तक किया पायलट

मेहताब ने बताया- हम तीनों की एग्रीकल्चरल बैकग्राउंड है। इसलिए हमें आइडिया था कि लोकल आंत्रप्रिन्योर्स छोटे किसानों को ज्यादा किराए पर मशीनरी देते थे। पंजाब, उत्तराखंड और यूपी में एक स्टडी करने पर पता चला कि 1500 किसानों में से 93 प्रतिशत रेग्युलर बेसिस पर मशीनरी उधार लेते हैं। इसके बाद हमने 10 मशीनरी ओनर्स के साथ दो सीजन के लिए पायलट किया और आठ महीने के अंत तक 400 कस्टमर बन गए। इसके बाद इसे और आगे बढ़ाया। इस प्रोजेक्ट से मार्केट में पारदर्शिता आई है। इस प्रोजेक्ट को इसलिए भी किया क्योंकि ज्यादातर कंपनियां अर्बन एरियाज को केटर करती हैं जबकि रूरल एरिया में काम करने की अपार संभावनाएं हैं।

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