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तरांडा ढांक: मशीन के बिना बनाई थी ये सड़क

गौरव भाटिया, चंडीगढ़ | ये तस्वीर हिमाचल के किन्नौर जिले में स्थित तरांडा ढांक की है। नेशनल हाईवे का ये ढाई किलोमीटर...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 01, 2018, 03:10 AM IST

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    गौरव भाटिया, चंडीगढ़ | ये तस्वीर हिमाचल के किन्नौर जिले में स्थित तरांडा ढांक की है। नेशनल हाईवे का ये ढाई किलोमीटर का हिस्सा चट्‌टानों को सिर्फ हैंड टूल्स से काटकर बनाया गया है। अंग्रेजों ने जब तिब्बत को जोड़ने के लिए इसका निर्माण शुरू कराया था तो उन्होंने विस्फोटकों का इस्तेमाल नहीं किया। क्योंकि विस्फोट से चट्‌टानें हिल जाती और भविष्य में टूट-टूट कर गिरती रहतीं। ये देश की पहली ऐसी सड़क है, जिसे बनाने के लिए मशीनों का उपयोग नहीं किया गया। यही वजह है कि आज 68 साल बाद भी सड़क का ये हिस्सा चट्‌टान गिरने की वजह से कभी बंद नहीं हुआ। इसे बनाने में सैकड़ों मजदूरों की जान गई थी।

    पहाड़ी कभी दरके नहीं, इसलिए विस्फोट नहीं किए; सिर्फ हैंडटूल्स से ढाई किमी. तक चट्‌टानें काटकर बनाई अपनी तरह की ये पहली सड़क 68 साल से कभी बंद नहीं हुई

    ज्यादातर को मजदूरी तक नहीं मिली थी। 19वीं शताब्दी के आिखरी दशकों में जब यहां काम शुरू कराया गया तो उस समय बेगारी का दौर था। अंग्रेज सरकार ने इस पूरे इलाके से युवाओं को इकट्‌ठा किया और काम पर लगा दिया। लेकिन, बाद में ज्यादातर को मजदूरी भी नहीं मिली। इस बात का रिकॉर्ड तक नहीं रखा गया कि इस चट्‌टानों को काटने वाले कितने लोगों की जान गई। यहां कई ऐसे परिवार हैं, जिनके बुजुर्गों ने इसमें काम किया था।

    फोटो : अश्वनी राणा

    पूरी सड़क बनाने में लगे 100 साल

    अंग्रेज अफसरों ने तिब्बत पर सरकारी नियंत्रण बनाए रखने और वहां से व्यापार को आगे बढ़ाने के लिए हिंदुस्तान-तिब्बत सड़क बनवाने का फैसला किया था। भारत में ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने जून 1850 में इसका आदेश जारी किया था। लेकिन, ये बनकर तैयार हुई आजादी के तीन साल बाद 1950 में। शिमला से शुरू होने वाली ये सड़क तिब्बत बॉर्डर पर स्थित शिपकी-ला तक जाती है।

    निर्माण के दौरान की तस्वीर।

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