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​पैरोल और सजा माफी राज्य सरकार की तरफ से कैदियों को दिए जाने वाला विशेषाधिकार, हक नहीं:कोर्ट

कहा-जरूरी नहीं सभी कैदियों को विशेषाधिकार दिए जाएं

ललित कुमार | Last Modified - Jun 28, 2018, 02:56 AM IST

​पैरोल और सजा माफी राज्य सरकार की तरफ से कैदियों को दिए जाने वाला विशेषाधिकार, हक नहीं:कोर्ट

चंडीगढ़.पैरोल और सजा में छूट या माफी देना राज्य सरकार की तरफ से दिए जाने वाला विशेषाधिकार है। ऐसे में प्रत्येक कैदी इस पर अपना हक नहीं समझ सकता। हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा है कि कैदी को दी जाने वाली सजा में पैरोल और सजा में छूट या माफी देना रिफोर्मस थ्योरी का एक हिस्सा है। ऐसे में प्रत्येक कैदी यह न समझे कि यह उसे मिलना वाला अधिकार है। संगरूर डिस्ट्रिक्ट जेल में बंद कैदी की तरफ से याचिका दायर कर जेल सुपरिटेंडेंट के 23 अप्रैल के फैसले को खारिज करने की मांग की गई जिसमें पैरोल दिए जाने की मांग को खारिज कर दिया गया था।

कोर्ट ने कहा- अधिकार और विशेषाधिकार में अंतर:जस्टिस दया चौधरी ने फैसले में कहा कि अधिकार और विशेषाधिकार में अंतर है। अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से दिए जाते हैं जबकि विशेषाधिकार राज्य की तरफ से शर्तों पर दिए जाते हैं और यह जरूरी नहीं है कि सभी नागरिकों को ये दिए जाएं। विशेषाधिकार राज्य सरकार की तरफ से दिए जाते हैं। ऐसे में जरूरी नहीं कि सभी सजायाफ्ता कैदियों को ये विशेषाधिकार दिए जाएं। कुछ कैदियों को इन्हें देने से इंकार भी किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने जेल सुपरिटेंडेंट के फैसले में दखल देने से इंकार करते हुए कहा कि याचिका को मंजूर नहीं किया जा सकता।

याची ने मांगी थी 4 हफ्ते की पैरोल:एनडीपीएस एक्ट के मामले में याची को संगरूर के एडीशनल सेशन जज ने 12 साल के कठोर कारावास और एक लाख रुपये जुर्माना किया था। सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील भी की गई जिस पर सुनवाई लंबित है। इसी दौरान करीबी रिश्तेदार के बेटे की शादी में शामिल होने के लिए चार सप्ताह की पैरोल दिए जाने की मांग की गई। जेल सुपरिटेंडेंट ने मांग को खारिज करते हुए कहा कि कुछ समय पहले ही सजा सुनाई गई है। ऐसे में पैरोल का लाभ नहीं दिया जा सकता। दूसरी तरफ याची की तरफ से कहा गया कि उन पर जमानत का मिसयूज करने का कोई आरोप नहीं है। ऐसे में पैरोल का लाभ दिया जा सकता है।

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