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मनुष्य को अपना संविधान भी बनाना चाहिए

मनुष्य को अपना संविधान भी बनाना चाहिए

पं. िवजयशंकर मेहता | Last Modified - Feb 09, 2018, 05:02 AM IST

  • मनुष्य को अपना संविधान भी बनाना चाहिए
    पं. िवजयशंकर मेहता

    संविधान केवल किसी राष्ट्र या किसी संस्थान का ही नहीं होता। मनुष्य को भी अपना संविधान बनाना चाहिए। वैसे तो मनुष्य दो तरह के नियमों से संचालित होता है। एक बाहरी नियम जो समाज, राष्ट्र, परिवार देते हैं और वह अपना जीवन उनसे बंधकर बिताता है।

    हर मनुष्य की तैयारी यह भी होनी चाहिए कि कोई निजी संविधान भी हो जिससे मेरी पर्सनल लाइफ संचालित रहे। अभी हमारा निजी जीवन भी बाहरी शक्तियों से संचालित होता है। हम अपनी खुशी के कारण बाहर या दूसरों में ढूंढते हैं। हम अपने को इतना भी स्वतंत्र नहीं रख पाते कि खुद प्रसन्न रह सकें। मनुष्य का पाथेय उसकी प्रसन्नता है। आनंद को अपनी आचार संहिता बनाते हुए उसे निजी रूप से यह घोषणा करना चाहिए कि खुश रहना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। अपने निजी संविधान पर काम करने की शुरुआत सांस से करनी चाहिए। अध्यात्म तो कहता है हमारी हर आती-जाती सांस का एक संविधान है।

    सांस इतनी अधिक कायदे से आती-जाती है कि उसे मालूम है कि करोड़ों-अरबों बार आने-जाने के बाद एक दिन मुझे अंतिम होना है। जिस दिन कोई अपनी सांस के प्रति होश में आता है, मानकर चलिए उसने अपना निजी संविधान सही बना लिया। निजी संविधान के निर्माण में सबसे पहले अपनी सांस देखिए। उसके बाद विचार शून्य हो जाएं। फिर आपके इस संविधान से घोषणा होगी कि आप मूल रूप से प्रसन्न व्यक्ति हो व अपनी प्रसन्नता का संचालन खुद करें। दूसरे इसमें कुछ नहीं कर सकते।

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Web Title: Man Should Also Make His Constitution
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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